महाकवि कालिदास : हमें कैैसा बनना चाहिए?

महाकवि कालिदास : हमें कैैसा बनना चाहिए? : कहानी राजा भोज के काल की है। उनके दरबार में एक से एक विद्वान दरबारी के रूप में आदर पाते थे। महाकवि कालिदास (Mahakavi Kalidas) जैसे विद्वान और कुशल कवि उनके दरबार की शोभा बढ़ाते थे। एक बार की बात है। राजा भोज ने अपने विद्वान दरबारियों से एक प्रश्न किया। प्रश्न था हमें कैसा बनना चाहिए?

Mahakavi Kalidas How should we become

प्रश्न के साथ-साथ राजा भोज की एक शर्त थी कि उसका उत्तर बोल कर नहीं देना है। प्रतीकों और चिन्हों के माध्यम से ही इस प्रश्न का उत्तर देने की आज्ञा थी। प्रश्न का विचार करने के लिए राजा भोज ने तीन दिन का समय दिया।

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तीन दिन बाद प्रश्न का उत्तर देने वाले दरबारी अपने-अपने प्रतीक चिन्हों के साथ उपस्थित हुए। सबसे पहले एक दरबारी आया। उसने महाराज के समक्ष एक सुन्दर गुलाब का फूल पेश किया। महाराज इस प्रतीक का अर्थ है हमे गुलाब की भांति बनना चाहिए। हमें तुम्हारा उत्तर पसंद आया।

इसके बाद एक अन्य-दरबारी ने एक संुदर तश्तरी में चांदी का एक गुटका पेश किया। राजा भोज ने तुरंत प्रतीक का अर्थ ग्रहण किया और बोले, अर्थात हमें चांदी की भांति चमकदार चरित्र वाला होना चाहिए। हमें यह प्रतीक भी पसंद आया किन्तु अभी कई प्रतियोगी शेष है अतः अंतिम निर्णय देना उचित नहीं।

अगले दरबारी ने मिट्टी का एक टुकड़ा पेश किया।देख कर पहले तो राजा भोज चकराए फिर उसका अर्थ समझते हुए बोले, मैं इसका अर्थ समझ रहा हूँ। तुमने इसके माध्यम से संम्भवतः यह दर्शाने का प्रयत्न किया है कि मिट्टी की भांती पर हितकारी होना चाहिए। जिस प्रहार मिट्टी हमें फल-फूल तथा अन्न देकर हमारा पोषण करती है उसी प्रकार हमें भी दूसरों का हित करना चाहिए।

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इसी प्रकार अन्य विद्वानों ने भी अपना-अपना प्रतीक प्रस्तुत किया। शर्त के अनुसार किसी ने एक शब्द भी नहीं बोला। सबसे अंत में महाकवि कालिदास को अवसर मिला। कालिदास के आदेश पर उनका अनुचर मखमली कपड़े से ढकी हुई तश्तरी लेकर उपस्थित हुआ। सभी दरबादियों की नजर तश्तरी पर अटक गई। राजा भोज के आदेश से तश्तरी का मखमली आवरण हटाया गया। आवरण हटते ही सभी दरबारी खिलखिला कर हंस पड़े। राजा भोज भी चकित रह गए। तश्तरी में ‘सरपत’ (एक प्रकार की घास) की कुछ टहनियाँ रखी हुई थी। राजा भोज ने हंसते हुए दरबारियों को चुप कराते हुए कहा, यह महा कवि कालिदास द्वारा प्रस्तुत किया गया है। इसमें कोई बड़ा मर्म छुपा है।

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इसके बाद काफी देर तक राजा भोज सरपत की टहनियों को निहारते हुए उसका मर्म समझने की कोशिश करते रहे। किन्तु कालिदास के इस प्रतीक का अर्थ वे न समझ पाए। अतः उन्होंने कालिदास से ही इसका अर्थ समझाने को कहा।

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किन्तु इस प्रतियोगिता में बोलना वर्जित है। यदि अन्य प्रतियोगी कोई आपत्ति न करे तो मैं अपना मुंख खोलू। कालिदास ने सविनय कहाँ।

हाँ, हाँ, हाँ, कोई आपत्ति नहीं है। सभी प्रतियोगियों ने एक स्वर में कहा और कालिदास के बोलने की प्रतीक्षा करने लगे।

महाराज यह सरपत की डाली है, जो तीखी, लचकदार और गरीबों के काम आने वाली होती है। हमें इसी भांति बनना चाहिए। चांदी अथवा सोने की भांति कोमल बनना भी एक शासक के लिए अहितकारी है। अतः मेरी समझ में यही प्रतीक सर्वथा उचित लगा। सरपत की डाली की लचक से हमें विनयशीलता की शिक्षा मिलती है। लचीली होने पर कठोर होती है। क्योंकि इसे गुलाब के फूल की भांति मसला नहीं जा सकता। एक शासक में विनय शीलता के साथ-साथ कठोरता भी आवश्यक है। वैसे तो यह बेकार की वस्तु है किन्तु गरीब किसानों का यह बड़ा हित करती है एक और जहाँ यह उनकी झोपड़ी का छाजन बनती है वही दूसरी ओर यह जाड़े में उनके लिए गर्म बिस्तर का काम करती है। एक अच्छे शासक को इस डाली से प्रेरणा लेनी चाहिए। उसे इसी की भांति विनयी किन्तु शासन के मामले में कठोर तथा गरीबों तथा किसानों की सुरक्षा प्रदान करने वाला होना चाहिए।

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राजा भोज को महाकवि कालिदास का स्पष्टीकरण सबसे उचित लगा। प्रतियोगिता का निर्णय उन्होंने कालिदास के पक्ष में किया। और उन्हें उचित पुरस्कार देकर सम्मानित किया।

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