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यह कहानी युवराज 'शौर्य' की है, जो जन्म से ही शांत स्वभाव का था और युद्ध कला, विशेषकर तलवारबाजी से बहुत डरता था। उसके पिता, महाराज 'पराक्रम', उसे कई बार रणभूमि में ले जाने की कोशिश करते, लेकिन शौर्य का डर कभी उसका पीछा नहीं छोड़ता। एक दिन, जब दुश्मन सेना राज्य पर हमला करती है और महाराज पराक्रम को बंदी बना लिया जाता है, तब डरपोक शौर्य को एक ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ता है जहाँ उसे या तो आत्मसमर्पण करना था या अपनी सारी हिम्मत बटोरकर लड़ना था। क्या शौर्य अपने डर पर काबू पाकर अपने पिता और राज्य को बचा पाएगा? यह जानने के लिए पढ़िए साहस और दृढ़ संकल्प की यह रोमांचक और प्रेरणादायक कहानी (Best Hindi Story Hindi).
चलिए, अब पढ़ते हैं यह शिक्षाप्रद और दिल छू लेने वाली कहानी...
डर पर जीत: कायर राजकुमार की बहादुरी की कहानी
बहुत समय पहले की बात है, एक भव्य राज्य था जिसका नाम 'विजयगढ़' था। इस राज्य पर महाराज 'पराक्रम' का शासन था, जो अपने साहस और न्यायप्रियता के लिए दूर-दूर तक जाने जाते थे। महाराज पराक्रम का एक ही पुत्र था, युवराज 'शौर्य'। नाम भले ही शौर्य था, लेकिन राजकुमार का स्वभाव उसके नाम से बिल्कुल विपरीत था। युवराज शौर्य तलवार की चमक से भी डरता था, और युद्ध की बातें सुनकर ही उसका चेहरा पीला पड़ जाता था।
महाराज पराक्रम ने अपने पुत्र को एक वीर योद्धा बनाने के लिए हर संभव प्रयास किया। उन्होंने राज्य के सबसे कुशल तलवारबाजों और सेनापतियों को लगाया, लेकिन राजकुमार का डर उसकी रग-रग में समाया हुआ था। वह कभी भी पूरी हिम्मत से तलवार नहीं उठा पाता था।
"पिताश्री, यह तलवार कितनी भारी है! और इसकी यह नुकीली धार... मैं इसे कैसे चलाऊँ?" राजकुमार अक्सर कहता।
महाराज उसे समझाते, "बेटा, एक राजकुमार को अपनी तलवार से नहीं डरना चाहिए। यही तुम्हारी और तुम्हारे राज्य की रक्षा करेगी।"
काफी कोशिशों के बाद, महाराज पराक्रम ने किसी तरह शौर्य को थोड़ी-बहुत तलवार चलाने की कला सिखा दी, लेकिन उसमें कभी वह जोश नहीं आया जो एक योद्धा में होता है। महाराज कई बार उसे युद्ध में अपने साथ ले जाने की कोशिश करते, ताकि रणभूमि का माहौल देखकर उसका डर दूर हो, लेकिन शौर्य हर बार कोई न कोई बहाना बनाकर पीछे हट जाता। महाराज अपने पुत्र के इस डर से बहुत चिंतित रहते थे।
एक दिन, विजयगढ़ पर दुश्मनों ने आक्रमण कर दिया। दुश्मन राज्य, 'क्रूरगढ़' की सेना, संख्या में बहुत बड़ी थी और उनके सैनिक क्रूरता के लिए कुख्यात थे। महाराज पराक्रम ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन दुश्मनों की संख्या इतनी अधिक थी कि कुछ ही घंटों में विजयगढ़ के सभी महारथी योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए। अंत में, केवल महाराज पराक्रम ही युद्ध के मैदान में अकेले डटे रह गए थे।
जब महल में यह खबर पहुँची कि युद्ध का पासा पलट चुका है और लगभग सब कुछ खत्म हो गया है, तो युवराज शौर्य को भी पता चला कि अब छिपने का कोई फायदा नहीं। उसके अंदर एक अजीब सी घबराहट के साथ-साथ एक नई भावना भी उमड़ रही थी, जिसे वह समझ नहीं पा रहा था। उसने हिम्मत करके महल से बाहर निकलने का फैसला किया।
जैसे ही शौर्य महल के मुख्य द्वार से बाहर निकला, उसने देखा कि सामने से क्रूरगढ़ की सेना धूल उड़ाती हुई उसकी ओर बढ़ रही है। वह एक पल के लिए डर गया। उसकी पुरानी आदत के अनुसार, वह अपने महल की ओर भागने के लिए पीछे मुड़ा।
लेकिन, जैसे ही वह पीछे पलटा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने देखा कि पीछे से भी दुश्मनों की एक और टुकड़ी आ चुकी थी और उन्होंने उसके पिता, महाराज पराक्रम को बंदी बना लिया था। महाराज को रस्सियों से बांधकर घसीटा जा रहा था।
महल के अंदर मौजूद सेवकों और रक्षकों ने यह देखकर तुरंत महल का विशाल दरवाज़ा बंद कर दिया, ताकि दुश्मन अंदर न आ सकें।
अब मैदान में युवराज शौर्य अकेला था। उसके सामने क्रूरगढ़ की पूरी सेना थी और पीछे उसके पिता बंदी थे। उसके पास दो ही विकल्प थे:
वह तुरंत हथियार डाल दे और दुश्मनों के सामने आत्मसमर्पण कर दे, अपनी जान बचा ले।
या, वह अपनी सारी हिम्मत बटोरकर तलवार उठाए और अपने पिता को बचाने के लिए, अपने डर से लड़ते हुए दुश्मनों का सामना करे।
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इस बार, कुछ अलग हुआ। शौर्य ने एक गहरी साँस ली। उसने अपने पिता की बेबस आँखों को देखा, और उसके अंदर से एक ज्वाला सी फूट पड़ी। उसने दूसरा विकल्प चुना। वह अब तक सिर्फ डर रहा था, लेकिन इस बार उसके अंदर कुछ टूट गया था।
शौर्य ने एक पुरानी, धूल भरी तलवार उठाई, जिसे वह कभी छूने से भी डरता था। वह 'जय विजयगढ़' का नारा लगाते हुए दुश्मनों पर टूट पड़ा।
महाराज पराक्रम ने जो थोड़ी-बहुत तलवारबाजी शौर्य को सिखाई थी, वह अब उसके काम आ रही थी। डर के बजाय, अब उसके मन में अपने पिता को बचाने का संकल्प था। उसका हर वार अचूक होता जा रहा था। दुश्मनों ने कभी सोचा नहीं था कि यह डरपोक राजकुमार इतनी बहादुरी से लड़ेगा। वह एक-एक करके दुश्मनों को धूल चटाने लगा।
राजकुमार शौर्य को इतनी बहादुरी से लड़ते देखकर, महल के अंदर के सेवकों और रक्षकों को भी जोश आ गया। उन्होंने महल का दरवाज़ा खोला और 'जय विजयगढ़' का नारा लगाते हुए लड़ाई में कूद पड़े।
कुछ ही देर में, शौर्य और उसके महल के रक्षकों ने मिलकर दुश्मनों को वहाँ से खदेड़ दिया। क्रूरगढ़ की सेना जान बचाकर भागी। शौर्य ने तेजी से अपने पिता के पास पहुँचकर उन्हें रस्सियों से आजाद करवाया।
महाराज पराक्रम ने अपने पुत्र को गर्व से गले लगा लिया। उनकी आँखों में आँसू थे। "मेरे बेटे, तुमने आज मेरा सिर गर्व से ऊँचा कर दिया। तुमने केवल मुझे नहीं, बल्कि पूरे विजयगढ़ को बचाया है।"
उस दिन से, युवराज शौर्य एक सच्चा योद्धा बन गया। उसने कभी भी तलवार से डरना बंद नहीं किया, लेकिन उसने यह भी सीख लिया कि असली ताकत डर को जीतने में है।
सीख (Moral of the Story)
इस कहानी से हमें यह अनमोल सीख मिलती है कि जब तक हम डरते हैं, हम किसी भी काम की शुरुआत नहीं कर पाते हैं। डर ही हमारी सफलता के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। यदि हम निडर होकर और पूरी हिम्मत के साथ किसी काम में लग जाएं, तो हमें कामयाबी ज़रूर मिल सकती है। डर एक भावना है, जिसे हम अपनी इच्छा शक्ति से जीत सकते हैं।
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