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मुझे आई-फोन चाहिए: आज के जमाने में स्मार्टफोन (Smartphone) बच्चों के जीवन का एक अहम हिस्सा बन गया है। लेकिन कभी-कभी यह जरूरत से ज्यादा दिखावे का सामान बन जाता है। यह कहानी एक ऐसे ही लड़के आरव की है, जो शहर की चकाचौंध में असली खुशियों को भूल गया था। बनारस की गलियों में रहने वाला 13 साल का आरव, अपने दोस्तों की देखा-देखी एक महंगी जिद पकड़ बैठा था। उसकी यह जिद न सिर्फ उसके माता-पिता के लिए परेशानी थी, बल्कि उसके खुद के समझने के लिए एक बड़ी चुनौती भी।
आरव की जिद और दोस्तों का दिखावा
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आरव स्कूल से घर लौटा तो उसका मुंह फूला हुआ था। उसने अपना बस्ता सोफे पर फेंका और जोर से चिल्लाया, "पापा, मुझे आई-फोन चाहिए!" रघुवीर जी, जो एक साधारण सरकारी दफ्तर में क्लर्क थे, ने अखबार से नजर हटाई और चश्मा ठीक करते हुए बोले, "बेटा, अभी पिछले साल ही तो तुम्हें नया फोन दिलाया था। वह बिल्कुल ठीक चल रहा है।"
"वो डब्बा फोन है पापा!" आरव ने पैर पटकते हुए कहा। "आज स्कूल में रोहन नया आई-फोन लाया था। सब उसके पीछे घूम रहे थे। उस फोन में इतना अच्छा कैमरा है, इतने भारी गेम्स चलते हैं। मेरा फोन तो दोस्तों के सामने निकालने में भी शर्म आती है। अगर आपने मुझे वो फोन नहीं दिलाया, तो मैं खाना नहीं खाऊंगा।"
बच्चों की जिद्दी आदतें अक्सर माता-पिता को धर्मसंकट में डाल देती हैं। रघुवीर जी जानते थे कि उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे एक फोन पर लाखों रुपये खर्च करें, वह भी सिर्फ एक बच्चे के खेलने के लिए। लेकिन वे आरव को डांटकर नहीं, बल्कि तर्क (Logic) से समझाना चाहते थे।
पिता की शर्त: मेहनत का गणित
रात को खाने की मेज पर सन्नाटा था। आरव अपनी थाली को घूर रहा था। रघुवीर जी ने शांति से कहा, "आरव, ठीक है। मैं तुम्हें वो फोन दिला दूंगा।" आरव की आँखों में चमक आ गई। "सच पापा?" "हाँ, लेकिन एक शर्त है," रघुवीर जी ने पानी का गिलास रखते हुए कहा। "तुम्हें उस फोन की कीमत का सिर्फ 10% हिस्सा अपनी मेहनत से कमाना होगा। बाकी 90% मैं दूंगा। उस फोन की कीमत 1 लाख रुपये है, यानी तुम्हें 10,000 रुपये जमा करने होंगे।"
आरव को लगा यह तो बहुत आसान है। उसने सोचा, "मैं दादाजी से मांग लूंगा या पॉकेट मनी बचा लूंगा।" रघुवीर जी ने उसके मन की बात पढ़ ली। "और सुन लो, यह पैसा किसी से मांगना नहीं है, न ही पॉकेट मनी का होगा। तुम्हें अपनी 'स्किल' (हुनर) का इस्तेमाल करके, घर के बाहर की दुनिया में काम करके यह पैसा कमाना होगा। तुम्हारे पास 2 महीने हैं।"
यह प्रेरणादायक कहानी अब एक दिलचस्प मोड़ लेने वाली थी। आरव ने चुनौती स्वीकार कर ली। उसे लगा कि वह आसानी से यह कर लेगा।
काम की तलाश और हकीकत का सामना
अगले दिन रविवार था। आरव बड़े जोश में निकला। वह पास की एक किराने की दुकान पर गया और अंकल से बोला, "अंकल, क्या मैं आपकी दुकान पर कुछ मदद कर सकता हूँ? मुझे पैसे चाहिए।" दुकानदार ने हँसते हुए कहा, "बेटा, तुम अभी छोटे हो। हिसाब-किताब में गलती कर दोगे तो मेरा नुकसान हो जाएगा।" आरव निराश होकर दूसरी जगह गया। एक कार धोने वाले के पास गया। उसने सोचा कार धोना तो आसान है। लेकिन जब उसने एक कार धोई, तो उसके कपड़े गीले हो गए, हाथों में सर्फ से जलन होने लगी और कमर दुखने लगी। कार वाले ने उसे काम के बदले सिर्फ 50 रुपये दिए।
आरव ने हिसाब लगाया - "50 रुपये एक कार के? 10,000 रुपये कमाने के लिए मुझे 200 कारें धोनी पड़ेंगी!" यह सोचकर ही उसका सिर चकरा गया। उसे पहली बार एहसास हुआ कि एसी कमरे में बैठकर जिस पैसे को वह 'मामूली' समझता था, उसे कमाने में कितना पसीना बहता है।
पुराना हुनर और नई दिशा
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एक हफ्ता बीत गया, आरव सिर्फ 300 रुपये ही कमा पाया था। वह निराश होकर अपने कमरे में बैठा था। तभी उसकी नजर अपनी पुरानी ड्राइंग बुक पर पड़ी। आरव चित्रकारी में बहुत अच्छा था, लेकिन मोबाइल गेम्स के चक्कर में उसने पेंटिंग छोड़ दी थी। उसने सोचा, "क्यों न मैं कुछ पेंटिंग्स बनाकर बेचूँ?"
उसने मेहनत और लगन से काम शुरू किया। उसने दीवाली के लिए हाथ से बने सुंदर ग्रीटिंग कार्ड्स और दीये सजाने का काम शुरू किया। वह अपनी सोसाइटी में गया और लोगों को अपने बनाए सैंपल दिखाए। लोगों को उसका काम पसंद आया। किसी ने 100 रुपये दिए, किसी ने 200।
दिन-रात मेहनत करके, स्कूल के बाद और छुट्टियों में काम करके, उसने डेढ़ महीने में किसी तरह 8,000 रुपये जमा कर लिए। उसकी उंगलियों में रंग लग गए थे, नींद कम हो गई थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक अलग ही संतोष था। उसने सीखा कि पैसा 'मांगना' आसान है, लेकिन 'कमाना' बहुत मुश्किल।
असली 'स्मार्ट' कौन?
दो महीने पूरे होने वाले थे। आरव के पास अब 9,500 रुपये थे। सिर्फ 500 रुपये कम। रघुवीर जी ने पूछा, "बेटा, क्या हुआ? आई-फोन का सपना पूरा होने वाला है?" आरव ने अपनी गुल्लक (Piggy bank) की तरफ देखा। उसने उन नोटों को गिना जो उसने एक-एक करके जमा किए थे। उसे याद आया कि कैसे उसने शर्मा आंटी के लिए भारी सामान उठाया था, कैसे देर रात तक दीये पेंट किए थे।
आरव ने पिता की ओर देखा और कहा, "पापा, क्या उस फोन में ऐसा कोई फीचर है जो मुझे एक बेहतर इंसान बना सके? या मेरे पेंटिंग के हुनर को बिना मेहनत के सुधार सके?" पिताजी मुस्कुराए, "नहीं बेटा। फोन सिर्फ एक उपकरण (Tool) है। हुनर तुम्हारे हाथों में है।"
आरव ने एक गहरी सांस ली। उसने कहा, "पापा, मुझे अब वह आई-फोन नहीं चाहिए।" रघुवीर जी चौंक गए, "क्यों? तुमने इतनी मेहनत की है।" आरव बोला, "पापा, मैंने इन दो महीनों में समझा कि 10,000 रुपये कमाने में कितनी मेहनत लगती है। अगर मैं 1 लाख रुपये उस फोन पर खर्च कर दूँ, जो 2 साल बाद पुराना हो जाएगा, तो यह मेरी और आपकी मेहनत की तौहीन होगी। मैं अपने कमाए पैसों से एक अच्छी आर्ट-किट (Art Kit) और एक टैबलेट लूँगा जिससे मैं अपनी पेंटिंग को डिजिटल बनाना सीख सकूँ। वह मेरे करियर में काम आएगा। मेरा पुराना फोन बात करने के लिए काफी है।"
निष्कर्ष: समझदारी की जीत
रघुवीर जी की आँखों में गर्व के आँसू थे। उनका बेटा अब बड़ा हो गया था। उसे समझ आ गया था कि 'कीमत' (Price) और 'महत्व' (Value) में क्या अंतर है। साहस सिर्फ दुश्मनों से लड़ने में नहीं, बल्कि अपने मन के लालच से लड़ने में भी होता है।
अगले दिन आरव स्कूल गया। रोहन अपने फोन का दिखावा कर रहा था। आरव मुस्कुराया और अपनी स्केचबुक निकालकर एक शानदार चित्र बनाने लगा। सारे बच्चे फोन छोड़कर आरव की पेंटिंग देखने जमा हो गए। आरव को समझ आ गया था कि असली 'स्मार्ट' उसका फोन नहीं, बल्कि उसका दिमाग और हुनर होना चाहिए।
इस कहानी से सीख (Moral of the Story):
पैसे का महत्व: पैसा पेड़ पर नहीं उगता, इसके पीछे माता-पिता की कड़ी मेहनत होती है।
जरूरत बनाम ख्वाहिश: हमें समझना चाहिए कि हमें किस चीज की वास्तव में जरूरत है और क्या सिर्फ एक दिखावा है।
- हुनर ही पहचान है: महंगे गैजेट्स से नहीं, बल्कि आपके गुण और कौशल (Skills) से आपकी असली पहचान बनती है।
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