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साहूकार का बटुआ: लालच का फंदा और ईमानदारी की जीत - हिंदी कहानी

साहूकार का बटुआ खो गया और एक गरीब किसान को मिला। इनाम देने के बजाय साहूकार ने चली चाल। पढ़िए कैसे बीरबल की चतुराई ने लालची को सिखाया सबक। ......

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साहूकार का बटुआ: लालच का फंदा और ईमानदारी की जीत - हिंदी कहानी- बच्चों, आपने अक्सर बड़ों से सुना होगा कि लालच करना बुरी बात है। आज हम आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहे हैं, जो साबित करती है कि बेईमानी का धन कभी फलता-फूलता नहीं है।

बहुत समय पहले की बात है, भारत के एक समृद्ध नगर काशीपुर में एक 'लखीराम' नाम का साहूकार रहता था। लखीराम के पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उसका दिल बहुत छोटा था। वह इतना कंजूस और लालची था कि अगर उसके हाथ से पसीना भी गिर जाए, तो वह उसे भी वापस उठा ले। उसका पूरा ध्यान बस इसी बात पर रहता था कि कैसे दूसरों का पैसा हड़प लिया जाए।

उसी नगर के बाहरी इलाके में एक गरीब किसान रहता था, जिसका नाम था 'दीनू'। दीनू बहुत मेहनती और ईमानदार इंसान था। वह दिन भर खेतों में पसीना बहाता और शाम को जो रूखा-सूखा मिलता, उसी में भगवान का शुक्रिया अदा करके सो जाता। दीनू मानता था कि ईमानदारी (Honesty) - विकिपीडिया ही इंसान का सबसे बड़ा गहना है।

जब मिला सड़क पर खजाना

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एक शाम, जब सूरज ढल रहा था और पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे, दीनू अपने खेत से काम खत्म करके घर लौट रहा था। अचानक उसके पैर को एक भारी चीज़ से ठोकर लगी। उसने नीचे झुककर देखा तो धूल में सनी एक रेशमी थैली पड़ी थी।

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दीनू ने थैली उठाई और उसे झाड़ा। जब उसने थैली का मुंह खोला, तो उसकी आँखें चौंधिया गईं! उस थैली में सोने की 100 चमचमाती मोहरें (Gold Coins) थीं। दीनू ने सोचा, "हे ईश्वर! यह साहूकार का बटुआ या किसी अमीर व्यापारी की जमा-पूंजी लगती है। अगर मैं इसे रख लूँ, तो मेरी गरीबी हमेशा के लिए मिट जाएगी।"

लेकिन तभी उसके मन में उसके पिता की सीख गूंजी - "बेटा, पराया धन मिट्टी के समान होता है।" दीनू ने तुरंत फैसला किया कि वह इस बटुए को अपने पास नहीं रखेगा, बल्कि इसके असली मालिक को ढूंढेगा।

साहूकार की मुनादी और इनाम का वादा

अगले दिन पूरे नगर में ढिंढोरा पिटा गया। "सुनो! सुनो! सुनो! नगर सेठ लखीराम जी का कीमती बटुआ बाजार में कहीं गिर गया है। जो कोई भी वह बटुआ लाकर देगा, सेठ जी उसे खुश होकर 10 सोने की मोहरें इनाम में देंगे!"

यह सुनते ही दीनू समझ गया कि वह बटुआ लखीराम जी का है। वह बिना देर किए सेठ की हवेली की ओर चल पड़ा। उसे लगा कि उसकी ईमानदारी का उसे उचित फल मिलेगा और 10 मोहरों से उसके परिवार के कई दुख दूर हो जाएंगे।

सेठ की हवेली और लालच का खेल

दीनू जब हवेली पहुँचा, तो लखीराम अपने मुनीम के साथ बैठा हिसाब-किताब कर रहा था। दीनू ने विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा, "सेठ जी, राम-राम! कल शाम मुझे रास्ते में यह बटुआ मिला था। मैंने मुनादी सुनी तो समझ गया कि यह आपका है। अपनी अमानत संभालिए।"

लखीराम ने झपट्टा मारकर बटुआ छीना। उसने तुरंत मोहरें गिनना शुरू किया। खन-खन की आवाज़ के साथ उसने गिना - "पूरे 100!" उसका बटुआ और पैसे सुरक्षित थे। लेकिन तभी लखीराम के मन में लालच का कीड़ा रेंगने लगा। उसने सोचा, "यह तो एक गंवार किसान है। इसे बुद्धू बनाना बहुत आसान है। अगर मैं इसे 10 मोहरें इनाम में दे दूँ, तो मेरा नुकसान हो जाएगा। क्यों न कोई चाल चलूँ?"

लखीराम ने अचानक अपना चेहरा गुस्से से लाल कर लिया और चिल्लाया, "अरे ओ चोर! तू मुझे मेरा ही बटुआ लौटाने आया है, लेकिन चोरी करने के बाद?"

दीनू हक्का-बक्का रह गया। "मालिक, आप यह क्या कह रहे हैं? मैंने तो थैली खोली तक नहीं थी।"

सेठ ने धूर्तता से कहा, "झूठ मत बोल! मेरे इस बटुए में 110 सोने की मोहरें थीं। अब इसमें सिर्फ 100 हैं। इसका मतलब तूने अपना इनाम (10 मोहरें) पहले ही इसमें से निकाल लिया है। अब तुझे कोई और इनाम नहीं मिलेगा। जा भाग जा यहाँ से, वरना तुझे कोतवाल के हवाले कर दूँगा!"

दीनू की आँखों में आंसू आ गए। वह समझ गया कि सेठ इनाम के पैसे बचाने के लिए झूठ बोल रहा है। उसने बहुत विनती की, लेकिन सेठ ने उसे धक्के मारकर हवेली से बाहर निकलवा दिया।

न्याय की गुहार और बीरबल का प्रवेश

दीनू रोता हुआ सीधे न्याय के दरबार में पहुँचा। उस समय वहां बुद्धिमान बीरबल (जो अपनी हाज़िरजवाबी के लिए प्रसिद्ध थे) मौजूद थे। दीनू ने अपनी पूरी आपबीती सुनाई। बीरबल ने दीनू के चेहरे की मासूमियत देखी और समझ गए कि किसान सच बोल रहा है और साहूकार का बटुआ पाकर सेठ की नीयत खराब हो गई है।

बीरबल ने तुरंत सिपाही भेजकर सेठ लखीराम को दरबार में बुलवाया। बीरबल ने सेठ से पूछा, "सेठ जी, क्या यह बात सच है कि आपने खोए हुए बटुए पर इनाम की घोषणा की थी?"

सेठ ने हाथ जोड़कर कहा, "जी हुजूर! मैंने कहा था कि जो मेरा बटुआ लाएगा, उसे 10 मोहरें दूँगा। लेकिन इस किसान ने तो पहले ही उसमें से 10 मोहरें चुरा लीं। मेरे बटुए में 110 मोहरें थीं, अब सिर्फ 100 बची हैं। तो हिसाब बराबर हुआ ना!"

बीरबल ने मुस्कुराते हुए दीनू की तरफ देखा और पूछा, "क्यों भाई, क्या तुमने इसमें से पैसे निकाले?" दीनू ने कसम खाते हुए कहा, "नहीं सरकार! मैं गरीब जरूर हूँ, लेकिन चोर नहीं। मुझे 100 मोहरें ही मिली थीं।"

बीरबल का अनोखा फैसला

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बीरबल ने थोड़ी देर सोचा और फिर एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने सबको चौंका दिया। उन्होंने कहा, "हम्म... सेठ लखीराम जी नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं, वे भला झूठ क्यों बोलेंगे? अगर वे कह रहे हैं कि उनके बटुए में 110 मोहरें थीं, तो जरूर 110 ही रही होंगी।"

सेठ का चेहरा खुशी से खिल उठा। उसे लगा कि वह जीत गया। फिर बीरबल ने दीनू की तरफ इशारा करते हुए कहा, "और यह किसान भी बहुत ईमानदार मालूम होता है। अगर यह कह रहा है कि इसे 100 मोहरों वाला बटुआ मिला, तो वह सच ही होगा।"

बीरबल ने अपनी कुर्सी से उठते हुए फैसला सुनाया: "इसका मतलब यह मामला बिल्कुल साफ है। साहूकार का बटुआ जिसमें 110 मोहरें थीं, वह अभी भी खोया हुआ है। और दीनू को जो बटुआ मिला है, उसमें सिर्फ 100 मोहरें हैं, यानी यह बटुआ सेठ लखीराम का नहीं है। यह किसी और का बटुआ है।"

बीरबल ने वह थैली दीनू के हाथ में थमा दी और कहा, "दीनू, यह बटुआ तुम अपने पास रखो। जब तक इसका असली मालिक (जिसका 100 मोहरों वाला बटुआ खोया हो) नहीं आ जाता, यह अमानत तुम्हारे पास रहेगी। और अगर कोई दावेदार नहीं आया, तो यह धन तुम्हारा।"

लालच का परिणाम

सेठ लखीराम के पैरों तले जमीन खिसक गई। 10 मोहरों के लालच में उसने अपनी पूरी 100 मोहरें गंवा दी थीं। वह बीरबल के पैरों में गिर पड़ा और गिड़गिड़ाने लगा। "हुजूर! मुझे माफ कर दें। मैंने झूठ बोला था। मेरे बटुए में 100 ही मोहरें थीं। मुझे मेरा पैसा वापस दिलवा दें।"

बीरबल ने सख्ती से कहा, "अब बहुत देर हो चुकी है सेठ। तुमने दरबार में झूठ बोलकर न केवल इस गरीब पर इल्जाम लगाया, बल्कि न्याय का भी समय बर्बाद किया। अब यह धन राजकोष में जमा होगा या इस किसान को मिलेगा। तुम्हें अपनी बेईमानी की सजा तो भुगतनी ही होगी।"

सेठ अपना सिर पकड़कर रोने लगा। उसे समझ आ गया कि अति लालच ने उसे बर्बाद कर दिया।

अंत में, उस बटुए का कुछ हिस्सा दीनू को उसकी ईमानदारी के इनाम के रूप में दिया गया और बाकी गरीबों में बांट दिया गया। दीनू खुशी-खुशी अपने घर गया और सेठ लखीराम ने उस दिन कसम खाई कि वह फिर कभी किसी के साथ छल नहीं करेगा।

बच्चों, यह कहानी हमें सिखाती है कि सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं।

इस कहानी से सीख (Moral of the Story):

  1. लालच का फल बुरा होता है: थोड़े से लाभ के लिए झूठ बोलने से हम अपना बड़ा नुकसान कर बैठते हैं।

  2. ईमानदारी सर्वश्रेष्ठ नीति है: दीनू की सच्चाई ने उसे इनाम दिलाया, जबकि सेठ की चालाकी ने उसे कंगाल बना दिया।

  3. दूसरों का हक न मारें: जो हमारा नहीं है, उस पर अधिकार जमाना गलत है।

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