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सच्चा राजा कौन? सम्राट अशोक की एक अनदेखी कहानी

यह इतिहास प्रसिद्ध सम्राट अशोक (Samrat Ashoka) के जीवन से जुड़ी एक अत्यंत प्रेरणादायक घटना है। यह कहानी उस समय की है जब उनके राज्य में भयंकर अकाल पड़ा था। यह दर्शाती है

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यह इतिहास प्रसिद्ध सम्राट अशोक (Samrat Ashoka) के जीवन से जुड़ी एक अत्यंत प्रेरणादायक घटना है। यह कहानी उस समय की है जब उनके राज्य में भयंकर अकाल पड़ा था। यह दर्शाती है कि एक राजा का असली धर्म सिर्फ सिंहासन पर बैठना नहीं, बल्कि अपनी प्रजा के दुख-दर्द में उनके साथ खड़ा होना है। भेष बदलकर कैसे एक चक्रवर्ती सम्राट ने एक गरीब बूढ़े की मदद की, यह जानकर आपकी आँखों में भी नमी आ जाएगी। सेवा और विनम्रता की मिसाल पेश करती यह एक बेहतरीन हिंदी कहानी (Best Hindi Story Hindi) है।

चलिए, अब पढ़ते हैं यह दिल को छू लेने वाली और सीख देने वाली कहानी...


सच्चा प्रजापालक: एक सम्राट की विनम्रता

बहुत पुरानी बात है। भारतवर्ष पर मौर्य वंश के महान चक्रवर्ती सम्राट अशोक का शासन था। उनका राज्य सुख और समृद्धि के लिए जाना जाता था, लेकिन प्रकृति के आगे किसकी चलती है? एक बार राज्य में भयंकर सूखा पड़ा। आसमान से आग बरसने लगी और धरती प्यास से चटक गई। खेतों में अनाज का दाना तक न बचा। प्रजा भूख और प्यास से त्राहि-त्राहि कर उठी।

जब यह खबर सम्राट अशोक तक पहुँची, तो उनका हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने तुरंत आदेश जारी किया, "राज्य के सभी शाही अन्न भंडार प्रजा के लिए खोल दिए जाएं। मेरे राज्य में कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं सोना चाहिए।"

राजा का आदेश पाते ही जगह-जगह राहत शिविर लगा दिए गए। सुबह होते ही अनाज लेने वालों की लंबी कतारें लग जातीं, जो सूरज ढलने तक खत्म होने का नाम नहीं लेती थीं। लोग घंटों धूप में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करते।

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ऐसी ही एक शाम, एक राहत केंद्र पर भारी भीड़ थी। अनाज बाँटने वाले कर्मचारी सुबह से काम करते-करते बुरी तरह थक चुके थे। सूरज डूबने को था और वे बस काम बंद करने ही वाले थे।

तभी, भीड़ को चीरता हुआ एक अत्यंत कमजोर और बूढ़ा व्यक्ति किसी तरह सामने पहुँचा। उसका शरीर हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया था और कपड़े तार-तार हो चुके थे। वह कांपते हाथों से बोला, "बेटा, थोड़ा अनाज मुझे भी दे दो, मेरे घर में दो दिन से चूल्हा नहीं जला है।"

बाँटने वाला कर्मचारी झुंझला उठा। थकान के मारे उसका पारा सातवें आसमान पर था। उसने बूढ़े को डांटते हुए कहा, "अरे बाबा! देखते नहीं शाम हो गई है? अब खैरात बंद हो चुकी है। जो लेना हो कल आना। हटो यहाँ से!"

बूढ़े की आँखों में आँसू आ गए। वह निराश होकर लौटने ही वाला था कि तभी वहाँ एक गठीले बदन का नौजवान आ पहुँचा। वह साधारण कपड़ों में था, लेकिन उसके चेहरे पर एक अलग ही तेज था।

उस नौजवान ने आगे बढ़कर अनाज बाँटने वाले कर्मचारी का हाथ पकड़ लिया और गंभीर आवाज़ में बोला, "भाई, यह तुम क्या कर रहे हो? यह बुजुर्ग सुबह से पंक्ति में सबसे पीछे खड़े थे। शरीर में ताकत न होने के कारण ये धक्के खाते हुए पीछे रह गए। इनका अधिकार तो सबसे पहले बनता है। इन्हें खाली हाथ लौटाना अधर्म होगा।"

उस नौजवान की आवाज़ में गजब की कड़क और आँखों में ऐसा अधिकार भाव था कि कर्मचारी सहम गया। उसने बिना कुछ बोले तुरंत अनाज तौलकर दे दिया।

बूढ़े व्यक्ति ने कांपते हाथों से अनाज की गठरी बांधने की कोशिश की, लेकिन कमजोरी के कारण उससे गठरी उठ ही नहीं रही थी।

यह देखकर वह नौजवान फिर आगे आया और मुस्कुराते हुए बोला, "बाबा, आप क्यों कष्ट करते हैं? लाइए, यह गठरी मैं आपके घर तक पहुँचा देता हूँ।"

बूढ़ा व्यक्ति संकोच में पड़ गया, "नहीं-नहीं बेटा, तुम क्यों तकलीफ उठाओगे? मैं ले जाऊँगा।"

"अरे बाबा, कैसा संकोच! मैं एक नौजवान हूँ और आप बुजुर्ग हैं। एक नौजवान का फर्ज है बुजुर्ग का सहारा बनना। चलिए, रास्ता दिखाइए," नौजवान ने जबरदस्ती गठरी अपने कंधे पर उठा ली।

दोनों धीरे-धीरे चल पड़े। रास्ते में बूढ़ा व्यक्ति उस अनजान मददगार को दुआएं देता जा रहा था। वह बोला, "जुग-जुग जियो मेरे बच्चे। इस जमाने में तुम जैसा मददगार मिलना मुश्किल है। तुम इस नगर में नए लगते हो, पहले कभी देखा नहीं?"

नौजवान ने बस मुस्कुराकर सिर हिला दिया, कुछ बोला नहीं।

वे कुछ दूर ही गए थे कि सामने से घोड़ों की टापें सुनाई दीं। राज्य के सैनिकों की एक टुकड़ी गश्त पर निकली थी। जैसे ही टुकड़ी के नायक की नज़र सिर पर गठरी उठाए उस नौजवान पर पड़ी, वह अवाक रह गया।

नायक तुरंत घोड़े से कूदा और दौड़कर उस साधारण से दिखने वाले नौजवान के सामने नतमस्तक हो गया और उसे फौजी सलामी दी।

बूढ़ा व्यक्ति यह देखकर हैरान रह गया। उसने देखा कि वह नौजवान अपनी उंगली होंठों पर रखकर सैनिक अधिकारी को चुप रहने और आगे बढ़ने का इशारा कर रहा है। सैनिक टुकड़ी आगे बढ़ गई।

बूढ़ा व्यक्ति भले ही कमजोर था, लेकिन उसकी बुद्धि अभी भी तेज थी। उसे माजरा समझते देर न लगी। उसके पैर कांपने लगे। उसे अहसास हो गया कि जो व्यक्ति उसके अनाज का बोझा अपने कंधे पर ढो रहा है, वह कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं मगध नरेश सम्राट अशोक हैं।

वह तुरंत वहीं जमीन पर घुटनों के बल बैठ गया और हाथ जोड़कर रुंधे गले से बोला, "महाराज! अनर्थ हो गया। मुझसे यह कैसा घोर अपराध हो गया? आप... आप स्वयं मेरा भार उठा रहे हैं? मुझे क्षमा करें अन्नदाता!"

सम्राट अशोक ने तुरंत अनाज की गठरी नीचे रखी और उस बूढ़े को सहारा देकर उठाया। उन्होंने बड़े स्नेह से कहा, "बाबा, इसमें अपराध कैसा? मैं राजा बाद में हूँ, पहले आपका सेवक हूँ। यदि एक राजा अपनी प्रजा का बोझ नहीं उठा सकता, उनके दुख में काम नहीं आ सकता, तो उसका सिंहासन पर बैठने का कोई अधिकार नहीं है।"

बूढ़े की आँखों से अविरल अश्रु धारा बह निकली। उसने गदगद होकर कहा, "धन्य है यह राज्य! आप केवल नाम के राजा नहीं, बल्कि सच्चे अर्थों में 'प्रजापालक' हैं।"

सीख (Moral of the Story)

यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा बड़प्पन पद, प्रतिष्ठा या धन में नहीं, बल्कि सेवा और विनम्रता में है। एक सच्चा नेता या शासक वही होता है जो अपनी प्रजा के सुख-दुख को अपना समझे और संकट के समय उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहे। सत्ता का अहंकार नहीं, बल्कि सेवा का भाव ही मनुष्य को महान बनाता है।

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