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सपनों का महल: बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से लेकिन बहुत ही सुंदर गाँव 'हरिपुर' में रोहन नाम का एक दस साल का लड़का रहता था। रोहन बहुत ही चंचल और कल्पनाशील बच्चा था। वह दिन भर अपने दोस्तों के साथ खेलने के बजाय, एक बड़े से आम के पेड़ के नीचे बैठकर आसमान को निहारता रहता था। उसकी आँखों में हमेशा एक ही सपना होता था - एक बहुत बड़ा और शानदार महल (Palace) बनाने का सपना।
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वह अक्सर अपनी माँ और दादाजी से कहता, "एक दिन मैं ऐसा घर बनाऊंगा जो राजाओं के महल जैसा होगा। उसमें सोने के दरवाज़े होंगे और चाँदी की सीढ़ियां होंगी!" लेकिन रोहन की एक बहुत बड़ी कमी थी। वह सपने तो बहुत बड़े-बड़े देखता था, लेकिन उन सपनों को पूरा करने के लिए कोई काम नहीं करना चाहता था। अगर माँ उसे पढ़ाई करने को कहती, तो वह कहता, "अरे माँ, जब मेरा सपनों का महल बन जाएगा, तो मुझे इन किताबों की क्या ज़रूरत पड़ेगी?"
कोरे सपने और सच्चाई
समय बीतता जा रहा था। रोहन के साथ पढ़ने वाले बच्चे परीक्षा में अच्छे नंबर ला रहे थे, कोई खेलकूद में आगे बढ़ रहा था, तो कोई चित्रकला में। लेकिन रोहन सिर्फ अपनी ख्याली पुलाव पकाने में व्यस्त था।
लोटपोट की हिंदी कहानियां में अक्सर बताया जाता है कि 'मुंगेरीलाल के हसीन सपने' कभी हकीकत नहीं बनते। रोहन के दादाजी, जो गाँव के एक बहुत ही सम्मानित और समझदार बुजुर्ग थे, रोहन की इस आदत को लेकर काफी चिंतित रहते थे। वे जानते थे कि अगर रोहन को अभी सही रास्ता नहीं दिखाया गया, तो वह जीवन में बहुत पीछे रह जाएगा। दादाजी ने मन ही मन एक योजना बनाई ताकि वे रोहन को जीवन की असली सच्चाई समझा सकें।
दादाजी की परीक्षा: लकड़ियों का महल
एक रविवार की सुबह, दादाजी ने रोहन को अपने पास बुलाया। उनके पास कुछ लकड़ियों के टुकड़े, कीलें, एक हथौड़ी और गोंद रखा हुआ था। दादाजी ने प्यार से कहा, "रोहन बेटा, तुम हमेशा एक बहुत बड़े महल की बात करते हो न? आज मुझे तुम्हारी मदद चाहिए। क्या तुम इन लकड़ियों से चिड़ियों के लिए एक छोटा सा, लेकिन सुंदर सा महल (बर्डहाउस) बना सकते हो?"
रोहन बहुत खुश हुआ। उसने सोचा कि यह तो बहुत आसान काम है। उसने दादाजी से कहा, "बस इतनी सी बात! आप देखते जाइए दादाजी, मैं अभी दुनिया का सबसे सुंदर लकड़ी का महल बनाता हूँ।"
दादाजी मुस्कुराए और वहाँ से चले गए। रोहन ने लकड़ियों को उठाया। लेकिन उसे तो काम करने की आदत ही नहीं थी। उसने बिना किसी नाप-जोख के, टेढ़ी-मेढ़ी लकड़ियों को एक साथ रखा और जल्दी-जल्दी गोंद से चिपका दिया। उसने सोचा कि बस बाहर से दिखने में यह घर जैसा लगना चाहिए, अंदर चाहे कैसा भी हो।
एक घंटे में रोहन ने दादाजी को आवाज़ लगाई, "दादाजी! देखिए, मेरा महल तैयार है!"
सपनों का महल या ताश का पत्ता?
दादाजी बाहर आए। उन्होंने उस लकड़ी के ढांचे को देखा। वह बहुत ही कमजोर और टेढ़ा-मेढ़ा था। उसमें कोई छत ठीक से नहीं लगी थी। दादाजी ने जानबूझकर अपने हाथ से उस लकड़ी के घर को हल्का सा धक्का दिया। भड़ाम! वह लकड़ी का घर एक ही पल में ताश के पत्तों की तरह टूट कर बिखर गया।
रोहन का मुँह लटक गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह बोला, "दादाजी, यह तो टूट गया। मैंने तो इसे इतने अच्छे से सोचा था।"
दादाजी रोहन के पास बैठे और उसके कंधे पर हाथ रखकर बोले, "बेटा, तुमने इसके बारे में 'सोचा' बहुत अच्छा था, लेकिन इसे बनाने में मेहनत और ध्यान बिल्कुल नहीं लगाया। तुमने नीव मज़बूत नहीं की, कीलों को सही जगह नहीं ठोका और बस जल्दी में काम खत्म कर दिया।"
दादाजी उसे अपने कमरे में ले गए। वहां उन्होंने रोहन को एक बहुत ही सुंदर और मज़बूत लकड़ी का छोटा सा घर दिखाया, जो उन्होंने खुद कई दिनों की मेहनत से बनाया था। "रोहन, क्या तुम जानते हो कि असली सपनों का महल कैसे बनता है?" दादाजी ने पूछा।
रोहन ने सिर हिलाकर कहा, "नहीं दादाजी।"
मेहनत की ईंटें और लगन का सीमेंट
दादाजी ने एक बहुत ही प्रेरणादायक कहानी के अंदाज में समझाना शुरू किया: "बेटा, सिर्फ आँखें बंद करके महल के सपने देखने से महल नहीं बन जाता। एक मजबूत महल बनाने के लिए सबसे पहले 'कड़ी मेहनत' की ईंटें चाहिए होती हैं। फिर उसमें 'लगन और अनुशासन' (Discipline) का सीमेंट मिलाना पड़ता है। और इन सबसे ज़रूरी है 'ज्ञान और पढ़ाई' की मजबूत नीव (Foundation)।"
उन्होंने आगे कहा, "तुम जो बड़े-बड़े सपने देखते हो, वे बहुत अच्छे हैं। इंसान को सपने जरूर देखने चाहिए। लेकिन अगर तुम उन सपनों को हकीकत में बदलने के लिए पसीना नहीं बहाओगे, पढ़ाई नहीं करोगे और मेहनत से जी चुराओगे, तो तुम्हारा सपना भी उस टूटे हुए लकड़ी के घर की तरह एक झटके में बिखर जाएगा।"
रोहन की नई शुरुआत
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रोहन को दादाजी की बात गहराई से समझ में आ गई। उसे अपनी गलती का अहसास हो गया। उसने महसूस किया कि वह अपने कीमती समय को सिर्फ खाली ख्यालों में बर्बाद कर रहा था। उसने उसी दिन तय किया कि अब वह सिर्फ सपने नहीं देखेगा, बल्कि उन सपनों को सच करने के लिए दिन-रात एक कर देगा।
उस दिन के बाद से रोहन पूरी तरह बदल गया। वह स्कूल का काम सबसे पहले करने लगा। उसने दादाजी के साथ मिलकर लकड़ियों का काम भी सीखा और अपने हाथों से चिड़ियों के लिए एक बहुत ही सुंदर और मजबूत 'सपनों का महल' बनाया, जिसे बारिश और हवा भी नहीं तोड़ सकती थी।
गाँव वाले भी रोहन के इस बदलाव को देखकर बहुत खुश हुए। रोहन जान गया था कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। आसमान के तारों को छूने के लिए भी ज़मीन पर मजबूत कदम रखने पड़ते हैं।
इस कहानी से सीख (Moral of the Story):
सपने देखना काफी नहीं: जीवन में बड़े सपने देखना अच्छी बात है, लेकिन बिना मेहनत के वे केवल कोरी कल्पना (Illusion) रह जाते हैं।
नीव की मजबूती: किसी भी सफलता रूपी महल को खड़ा करने के लिए शिक्षा और कड़ी मेहनत की नीव का मजबूत होना बहुत ज़रूरी है।
- कर्म ही पूजा है: सोचने से ज्यादा करने (Action) पर विश्वास रखना चाहिए। जो मेहनत का पसीना बहाता है, उसी का महल हकीकत में बनता है।
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