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अगर पेड़ भी चलते होते: बच्चों की कल्पनाशील हिंदी कविता

कविता “अगर पेड़ भी चलते होते” बच्चों की कल्पनाशील सोच और प्रकृति के प्रति उनके लगाव को बेहद सरल और मज़ेदार ढंग से प्रस्तुत करती है। यह रचना एक मासूम सवाल से शुरू होती है

By Lotpot
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कविता “अगर पेड़ भी चलते होते” बच्चों की कल्पनाशील सोच और प्रकृति के प्रति उनके लगाव को बेहद सरल और मज़ेदार ढंग से प्रस्तुत करती है। यह रचना एक मासूम सवाल से शुरू होती है. अगर पेड़ चल सकते, तो क्या होता। इसी कल्पना के सहारे कविता बच्चों को पेड़ों की उपयोगिता, उनकी छाया, फल और सुरक्षा का महत्व समझाती है।

कवि ने बच्चों की दुनिया से जुड़ी छोटी-छोटी स्थितियों को शामिल किया है। तेज़ धूप में छिपना, अचानक भूख लगने पर फल तोड़कर खाना, या बाढ़ और कीचड़ में पेड़ों का सहारा लेना. ये सभी दृश्य कविता को जीवंत और relatable बनाते हैं। यह कविता बच्चों को हँसाते हुए सोचने पर मजबूर करती है कि पेड़ हमारे जीवन में कितने ज़रूरी हैं।

यह रचना बाल कविता, पर्यावरण शिक्षा, और प्रकृति प्रेम जैसे विषयों के लिए बेहद उपयुक्त है। स्कूल की कक्षाओं, पाठ्यपुस्तकों, बाल पत्रिकाओं और पर्यावरण दिवस जैसे अवसरों पर इस कविता का प्रयोग आसानी से किया जा सकता है। साथ ही, यह कविता बच्चों में पेड़ों के संरक्षण और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की भावना भी विकसित करती है।

SEO दृष्टि से, यह कविता उन पाठकों और शिक्षकों के लिए उपयोगी है जो पेड़ों पर हिंदी कविता, बच्चों की पर्यावरण कविता, या बाल साहित्य से जुड़ा गुणवत्तापूर्ण कंटेंट खोजते हैं। सरल भाषा और स्पष्ट भाव इसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लोकप्रिय बनाते हैं।

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अगर पेड़ भी चलते होते,
कितने मज़े हमारे होते।

बाँध तने में उनके रस्सी,
चाहे जहाँ कहीं ले जाते।

जहाँ कहीं भी धूप सताती,
उनके नीचे हम छिप जाते।

भूख सताती अगर अचानक,
तोड़ मधुर फल उनके खाते।

आती कीचड़, बाढ़ कहीं तो,
झट उनके ऊपर चढ़ जाते॥

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