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डाकिया कविता बच्चों के लिए लिखी गई एक सरल, मधुर और भावनात्मक हिंदी बाल कविता है, जो रोज़मर्रा के जीवन से जुड़े एक बेहद खास पात्र. डाकिया. को केंद्र में रखती है। पुराने समय में जब मोबाइल फोन और इंटरनेट नहीं थे, तब डाकिया ही खुशियों, निमंत्रणों और अपनों की खबरें लेकर आता था। यह कविता उसी एहसास को बच्चों की भाषा में बहुत सहज ढंग से सामने लाती है।
इस कविता में डाकिए का खाकी कपड़े पहनना, उसके हाथ में थैला होना और घर-घर जाकर चिट्ठियाँ बाँटना. ये सभी चित्र बच्चों की कल्पना को जीवंत बना देते हैं। कविता में जैसे ही चिट्ठी के ज़रिए मामा की शादी की खबर आती है, पूरा माहौल खुशी और उत्साह से भर जाता है। इससे बच्चों को यह समझ में आता है कि एक छोटी-सी चिट्ठी भी कितनी बड़ी खुशी ला सकती है।
डाकिया कविता बच्चों के लिए इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें पारिवारिक संबंध, मिल-जुलकर खुशियाँ मनाने और सामाजिक जुड़ाव जैसे मूल्य बहुत सहजता से सिखाए गए हैं। यह कविता स्कूलों में कविता पाठ, हिंदी पठन अभ्यास, बाल साहित्य या बच्चों की पत्रिकाओं के लिए बेहद उपयोगी है। सरल शब्द, लयबद्ध पंक्तियाँ और खुशियों से भरी कहानी इसे छोटे बच्चों के लिए याद रखने और सुनाने लायक बनाती हैं।
अगर आप बच्चों को हिंदी भाषा से जोड़ना चाहते हैं और उन्हें भावनाओं व रिश्तों का महत्व सिखाना चाहते हैं, तो यह कविता एक बेहतरीन विकल्प है।
कविता: डाकिया
बच्चो, देखो डाकिया आया,
हाथ में एक थैला लाया।
पहने है वह खाकी कपड़े,
चिट्ठी कई हाथ में पकड़े।
घर-घर में वह बाँटे चिट्ठी,
चिट्ठी में है खबर खुशी की।
मामा की शादी है आई,
उसमें खाएँगे हम दूध-मलाई।
शादी में हम जाएँगे,
मिलकर धूम मचाएँगे।
