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कद्दू जी की बारात
“कद्दू जी की बारात” एक बेहद रोचक, कल्पनाशील और हास्य से भरपूर कविता है, जो बच्चों की दुनिया को सब्ज़ियों के मज़ेदार पात्रों से जोड़ती है। इस कविता में रोज़मर्रा की सब्ज़ियों को इंसानों की तरह दिखाया गया है, जो बारात में शामिल होकर नाचते-गाते हैं, बाजा बजाते हैं और शादी का आनंद लेते हैं। बच्चों को ऐसी कविताएँ बहुत पसंद आती हैं क्योंकि इनमें कल्पना (imagination) और मनोरंजन (entertainment) दोनों का सुंदर मेल होता है।
यह कविता बच्चों की रचनात्मक सोच (creative thinking) को बढ़ावा देती है और उन्हें यह सिखाती है कि पढ़ाई भी मज़ेदार हो सकती है। कद्दू को राजा बनाना, लौकी को दुल्हन दिखाना और आलू-टमाटर को बाराती बनाकर पेश करना बच्चों के मन में मुस्कान लाता है। साथ ही, यह कविता उनकी भाषा क्षमता (language skills) को बेहतर बनाती है क्योंकि इसमें सरल शब्दों, तुकांत पंक्तियों और लयात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।
“कद्दू जी की बारात” बच्चों के लिए न केवल एक मनोरंजक कविता है, बल्कि यह उनके सपनों और कल्पनाओं की दुनिया को भी विस्तार देती है। अंत में यह पता चलना कि पूरी कहानी एक सपना थी, बच्चों को यह समझाता है कि सपनों की दुनिया कितनी रंगीन और अनोखी हो सकती है। यही कारण है कि यह कविता प्राथमिक कक्षाओं के लिए बहुत उपयुक्त और लोकप्रिय है।
कद्दू जी की बारात
कद्दू जी की चली बारात,
हुई बताशों की बरसात।
बैंगन की गाड़ी के ऊपर,
बैठे कद्दू राजा,
शलजम और प्याज़ ने मिलकर,
खूब बजाया बाजा।
मेथी, पालक, भिंडी, तोरी,
टिंडा, मूली, गाजर,
बने बाराती नाच रहे थे,
आलू, मटर, टमाटर।
कद्दू जी हँसते मुस्काते,
लौकी दुल्हन लाए,
कटहल और करेले जी ने,
चाट-पकौड़े खाए।
प्रातः पता चली यह बात,
सपना देखा था यह रात!
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