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“कौवे का स्कूल” एक ऐसी बाल कविता है, जो सरल शब्दों और हल्के हास्य के माध्यम से बच्चों को एक ज़रूरी जीवन-पाठ सिखाती है। इस कविता में कौवा एक बच्चे की तरह स्कूल जाता है। उसके सिर पर भारी बस्ता है, मन में पढ़ने का उत्साह है, लेकिन जल्दबाज़ी में वह रबर और पेंसिल भूल जाता है। यही छोटी-सी भूल कविता का सबसे बड़ा संदेश बन जाती है।
यह कविता बच्चों को यह समझाती है कि पढ़ाई केवल किताब खोलने का नाम नहीं है, बल्कि सही तैयारी भी उतनी ही ज़रूरी होती है। शिक्षक का व्यवहार भी यहाँ बहुत महत्वपूर्ण रूप में सामने आता है। टीचर जी कौवा को डाँटते नहीं, बल्कि प्यार से समझाकर वापस भेजते हैं। इससे बच्चों में डर नहीं, बल्कि सीखने की भावना पैदा होती है।
कविता की भाषा सरल, चित्रात्मक और बाल-मन के अनुकूल है। कौवा जैसा परिचित पक्षी जब स्कूल जाता हुआ दिखता है, तो बच्चों को कहानी से जुड़ाव महसूस होता है। हँसी के साथ-साथ यह कविता अनुशासन, जिम्मेदारी और गलती से सीखने का संदेश देती है।
कौवा का स्कूल कविता न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि बच्चों को यह भी सिखाती है कि गलती होना बुरा नहीं है, लेकिन गलती को दोहराना ज़रूर गलत है। यही वजह है कि यह कविता स्कूल, मैगज़ीन और बच्चों की किताबों के लिए एक बेहतरीन रचना बन जाती है।
कौवे का स्कूल कविता
सुबह का सूरज मुस्कुराया,
पंख फैलाकर कौवा आया।
सिर पर भारी बस्ता लटकाए,
स्कूल जाने के सपने सजाए।
कौवा जी की चाल निराली,
आँखों में चमक भोली-भाली।
सोचा आज पढ़ेंगे मन से,
अक्षर बनेंगे पंखों जैसे।
जल्दी-जल्दी घर से निकले,
रास्ते में सपनों से मिले।
कक्षा पहुँचे, घंटी बजी,
लेकिन एक बात रह गई छिपी।
न रबर साथ, न पेंसिल पास,
सोच में पड़ गए कौवा उदास।
टीचर जी ने प्यार से पूछा,
“क्यों बेटा, चेहरा क्यों सूखा?”
कौवा बोला झेंप में आकर,
“भूल गया हूँ, गलती करके।”
टीचर जी ने समझाया हँसकर,
“गलती से ही सीखो हर पल।”
“घर जाओ, सामान लेकर आओ,
तैयारी से फिर स्कूल आओ।”
कौवा समझा बात सही,
सीख मिली बड़ी अनमोल यही।
पढ़ाई में केवल किताब नहीं,
तैयारी भी है उतनी ही सही।
जो भूल से सीख ले हर बार,
वही बनता है होशियार।
कौवा लौटा मन में ठानकर,
अब न भूलूँगा सोच-समझकर।
स्कूल सिर्फ पढ़ने की जगह नहीं,
जीवन सिखाने का घर भी यही।
