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कविता “किसान” भारत के उस अनदेखे नायक की कहानी कहती है, जो हर सुबह सूरज से पहले जागता है और हर मौसम में बिना रुके काम करता है। यह रचना किसान के परिश्रम, त्याग और अनुशासन को सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों में सामने रखती है। पूरब की पहली लाली से पहले खाट छोड़ देना और चिड़ियों के जागने से भी पहले खेतों की ओर निकल जाना. यह दृश्य केवल एक दिनचर्या नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी का प्रतीक है।
कविता में किसान की मेहनत को गर्म लू और तपती धरती के संदर्भ में दिखाया गया है, जहाँ आराम की कोई जगह नहीं होती। बैलों की देखभाल से लेकर खेत के हर काम तक, किसान अपने कर्तव्य को पहले रखता है। उसके जीवन में न तो छुट्टी होती है और न ही त्योहार का अवकाश, फिर भी वह शिकायत नहीं करता। यही धैर्य और समर्पण उसे समाज की रीढ़ बनाता है।
यह कविता किसान जीवन, परिश्रम की महिमा, और भारतीय ग्रामीण संस्कृति को उजागर करती है। स्कूलों की प्रार्थना सभा, किसान दिवस, साहित्यिक मंचों और शैक्षिक ब्लॉग्स के लिए यह रचना बेहद उपयुक्त है। SEO दृष्टि से भी यह कविता उन पाठकों तक पहुँचने में मदद करती है जो किसान पर हिंदी कविताएँ, प्रेरक साहित्य और ग्रामीण भारत से जुड़े विषय खोजते हैं।
कविता
किसान
नहीं हुआ है अभी सवेरा,
पूरब की लाली पहचान।
चिड़ियों के जगने से पहले,
खाट छोड़ उठ गया किसान।
गरम-गरम लू चलती सन-सन,
धरती जलती तवे समान।
तब भी करता काम खेत पर,
बिना किए आराम किसान।
खिला-पिलाकर बैलों को ले,
करने चला खेत पर काम।
नहीं कभी त्योहार न छुट्टी,
उसको नहीं कभी आराम।
