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नमक vs रुई: आलसी गधे का मजेदार किस्सा

शॉर्टकट हमेशा सही नहीं होते। पढ़िए 'नमक vs रुई' की यह मज़ेदार कहानी, जहाँ एक आलसी गधे ने अपनी चालाकी से खुद का ही नुकसान कर लिया।................

By Lotpot
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नमक vs रुई: आलसी गधे का मजेदार किस्सा:- प्यारे बच्चों! क्या कभी आपका मन किया है कि होमवर्क न करना पड़े और कोई जादू हो जाए? हम सब कभी-न-कभी काम से बचने के लिए 'शॉर्टकट' ढूँढ़ते हैं। लेकिन क्या आपको पता है? कभी-कभी यह शॉर्टकट हमें ऐसे लंबे रास्ते पर ले जाता है जहाँ सिर्फ़ पछतावा मिलता है। आज की कहानी Mehnat Se Ji Churane Ka Phal इसी बारे में है। यह किस्सा है 'रामपुर' के एक व्यापारी दीनू काका और उनके 'ओवर-स्मार्ट' गधे चुलबुल का। चुलबुल ने सोचा कि वह दुनिया का सबसे अक्लमंद जानवर है, लेकिन अंत में उसे जो 'बोझ' उठाना पड़ा, वह उसे ज़िंदगी भर याद रहा।

कहानी: चालाकी पड़ी भारी

चुलबुल: आलस का बादशाह

रामपुर गाँव में दीनू काका नाम के एक व्यापारी रहते थे। वे नमक (Salt) और रुई (Cotton) का व्यापार करते थे और रोज़ शहर जाकर सामान बेचते थे। उनके पास एक गधा था, जिसका नाम था चुलबुल

चुलबुल दिखने में तो हट्टा-कट्टा था, लेकिन काम के मामले में एकदम फिसड्डी। उसका बस चलता तो वह दिन भर हरी घास पर लेटकर सपने देखता रहता। जब भी दीनू काका उसकी पीठ पर सामान लादते, चुलबुल ऐसा मुँह बनाता जैसे उस पर पहाड़ रख दिया गया हो।

चुलबुल अक्सर अपने दोस्त, शेरू बैल से कहता, "यार शेरू, ये इंसान कितने बेवकूफ होते हैं। दिन भर मेहनत करते हैं। असली मज़ा तो आराम में है। देखना, एक दिन मैं ऐसी तरकीब लगाऊंगा कि मुझे काम ही न करना पड़े।" शेरू समझाता, "चुलबुल, मेहनत का फल मीठा होता है।" चुलबुल हँसता, "अरे छोड़ो! मीठा फल बाज़ार से खरीद लेंगे, मेहनत कौन करे?"

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नमक की बोरी और 'जादुई' डुबकी

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एक गर्म सुबह, दीनू काका ने चुलबुल की पीठ पर नमक की दो भारी बोरियाँ लाद दीं। "चलो चुलबुल, आज बाज़ार में नमक की मांग ज़्यादा है, जल्दी चलना है," काका ने रस्सी खींची।

चुलबुल का तो रोना ही निकल गया। "हाय राम! इतना भारी बोझ! मेरी तो कमर टूट जाएगी।" वह कछुए की चाल से चलने लगा।

रास्ते में एक छोटी नदी पड़ती थी। नदी का पानी ठंडा और साफ़ था। पुल नहीं था, इसलिए पानी में से होकर गुज़रना पड़ता था। जैसे ही चुलबुल नदी के बीच में पहुँचा, उसका पैर एक पत्थर से टकराया और वह धड़ाम से पानी में गिर गया।

दीनू काका घबरा गए। "अरे! मेरा गधा डूब न जाए!" उन्होंने जल्दी से उसे डंडे के सहारे उठाया। लेकिन जब चुलबुल खड़ा हुआ, तो उसे एक अजीब चीज़ महसूस हुई। "अरे! यह क्या? मेरी पीठ का बोझ तो एकदम हल्का हो गया!"

बच्चों, आप तो जानते ही हैं—नमक पानी में घुल जाता है। जैसे ही बोरियाँ पानी में भीगीं, आधा नमक बह गया और बोरियाँ हल्की हो गईं। चुलबुल ख़ुशी से नाचने लगा (मन ही मन)। "वाह! यह तो कमाल हो गया। अब समझ आया, कामचोरी का यह सबसे बढ़िया तरीका है!" दीनू काका बेचारे उदास हो गए क्योंकि उनका नुकसान हो गया था, लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं और घर वापस लौट आए।

रोज़-रोज़ का नाटक

अगले दिन फिर वही हुआ। दीनू काका ने नमक लादा। चुलबुल ख़ुशी-ख़ुशी चला। जैसे ही नदी आई, चुलबुल ने जानबूझकर पैर फिसलाने का नाटक किया और—छपाक!—पानी में बैठ गया। नमक घुल गया, बोझ हल्का हो गया।

तीसरे दिन भी यही हुआ। अब तो चुलबुल को लगा कि वह आइंस्टीन बन गया है। वह शेरू बैल के पास गया और बोला, "देखा गुरु? इसे कहते हैं दिमाग। अब मैं रोज़ यही करूँगा और मज़े करूँगा।"

लेकिन दीनू काका कोई कच्चे खिलाड़ी नहीं थे। उन्हें शक हो गया था। उन्होंने सोचा, "यह गधा सिर्फ़ नदी में ही क्यों गिरता है? और गिरने के बाद इतना खुश क्यों दिखता है? बेटा चुलबुल, अगर तुम डाल-डाल हो, तो मैं पात-पात हूँ।"

दीनू काका का मास्टरस्ट्रोक (The Trap)

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चौथे दिन दीनू काका ने चुलबुल की पीठ पर नमक नहीं, बल्कि रुई (Cotton/Wool) की बड़ी-बड़ी बोरियाँ लाद दीं। रुई वैसे तो हल्की थी, लेकिन देखने में बहुत ज़्यादा लग रही थी।

चुलबुल ने सोचा, "आज तो और भी बड़ा बोझ है। कोई बात नहीं, मेरी 'जादुई डुबकी' सब ठीक कर देगी।" वह नदी के पास पहुँचा। दीनू काका ने उसे गौर से देखा। चुलबुल ने इधर-उधर देखा और जानबूझकर—धड़ाम!—पानी में बैठ गया। वह मन ही मन हँस रहा था, "अब यह बोझ भी हल्का हो जाएगा।"

वह पानी में काफी देर तक बैठा रहा ताकि रुई अच्छे से भीग जाए। "चलो बेटा, अब उठो," दीनू काका ने मुस्कुराते हुए कहा।

चुलबुल ने उठने की कोशिश की। "उफ्फ! यह क्या?" उससे हिला भी नहीं जा रहा था! जो बोझ पहले 10 किलो का था, पानी सोखने के बाद अब वह 50 किलो का हो चुका था। रुई ने स्पंज की तरह पानी पी लिया था।

चुलबुल की आँखों में आंसू आ गए। उसकी टांगें कांप रही थीं। दीनू काका ने कड़क आवाज़ में कहा, "क्यों बेटा? आज जादू उल्टा पड़ गया? मुझे बेवकूफ समझ रखा था? अब चलो बाज़ार, और यह पूरा गीला बोझ तुम्हें ही उठाना पड़ेगा।"

भारी सबक और पछतावा

उस दिन चुलबुल को बाज़ार तक जाने में नानी याद आ गई। उसका शरीर दुख रहा था, सांस फूल रही थी। रास्ते में उसे शेरू बैल मिला। शेरू ने पूछा, "क्या हुआ दोस्त? आज तुम्हारी जादुई तरकीब काम नहीं आई?" चुलबुल ने सिर झुका लिया। "भाई, मेरी चालाकी ने ही मुझे फंसा दिया। अगर चुपचाप सूखी रुई ले जाता, तो मज़े में रहता। यह गीला बोझ तो मेरी जान ले लेगा।"

शाम को घर लौटकर चुलबुल ने कसम खाई कि वह अब कभी कामचोरी नहीं करेगा। उसने समझ लिया कि मालिक को धोखा देना और मेहनत से भागना, अंत में खुद को ही भारी पड़ता है।

निष्कर्ष: शार्टकट महँगा पड़ता है

तो बच्चों, चुलबुल की कहानी से हमें पता चलता है कि हर बार चालाकी काम नहीं आती। कभी-कभी हमारा आलस हमारे लिए इतना बड़ा बोझ बन जाता है जिसे उठाना मुश्किल हो जाता है।

इस कहानी से सीख (Moral)

इस कहानी से हमें यह मज़ेदार लेकिन गंभीर सीख मिलती है:

  1. मेहनत का कोई विकल्प नहीं (No Shortcut to Success): काम से जी चुराने के लिए लगाए गए दिमाग का परिणाम अक्सर बुरा होता है।

  2. चालाकी खुद पर भारी पड़ती है: हम दूसरों को कुछ समय के लिए मूर्ख बना सकते हैं, लेकिन हमेशा के लिए नहीं।

Wikipedia Link

अधिक जानकारी के लिए देखें: गधा (Donkey) - विकिपीडिया 

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