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जो जीता वही सिकंदर: भोलूराम और गोलगप्पापुर की महा-रेस

पढ़िए 'जो जीता वही सिकंदर' पर आधारित भोलूराम की मज़ेदार कहानी। कैसे एक फुसफुसी साइकिल और अपनी सूझबूझ से भोलू ने घमंडी तेज़ सिंह को हराया। बच्चों के लिए बेहतरीन कॉमेडी कहानी।

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अक्सर हम सोचते हैं कि जिसके पास सबसे अच्छे साधन, सबसे तेज़ रफ़्तार या सबसे महंगी चीज़ें होती हैं, वही हमेशा जीतता है। लेकिन "जो जीता वही सिकंदर" मुहावरा हमें सिखाता है कि अंत में वही विजेता माना जाता है जो अपनी बुद्धिमानी और लगन से लक्ष्य तक पहले पहुँचता है, चाहे रास्ते में कितनी भी मुश्किलें क्यों न आई हों। यह कहानी 'गोलगप्पापुर' के एक ऐसे ही साधारण लड़के की है, जिसने अपनी फटी-पुरानी साइकिल और अपनी हाज़िरजवाबी से पूरे शहर को चौंका दिया। आइए जानते हैं भोलूराम के 'सिकंदर' बनने की यह मज़ेदार दास्तान।

गोलगप्पापुर का सबसे 'सुस्त' धावक: भोलूराम

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हिमालय की वादियों के पास एक छोटा सा कस्बा था—'गोलगप्पापुर'। यहाँ के लोग खाने-पीने के इतने शौकीन थे कि यहाँ की रेस भी अक्सर जलेबी की दुकानों पर खत्म होती थी। इसी शहर में भोलूराम नाम का एक लड़का रहता था। भोलूराम स्वभाव से बहुत ही सीधा और थोड़ा सुस्त था। उसे रफ़्तार से ज्यादा स्वाद में दिलचस्पी थी।

दूसरी ओर था तेज़ सिंह। तेज़ सिंह शहर के अमीर ज़मींदार का बेटा था। उसके पास दुनिया की सबसे महंगी स्पोर्ट्स साइकिल थी, जिसमें 21 गियर थे और जो हवा से बातें करती थी। तेज़ सिंह को अपनी रफ़्तार पर इतना घमंड था कि वह सबको 'कछुआ' कहकर चिढ़ाता था।

एक दिन तेज़ सिंह ने पूरे शहर में मुनादी करवा दी—"अगर गोलगप्पापुर में किसी में दम है, तो कल सुबह 'पहाड़ी चौक' से 'झरना पॉइंट' तक की रेस में मुझे हराकर दिखाए। जो जीतेगा, उसे 'गोलगप्पापुर का सिकंदर' कहा जाएगा और उसे एक साल तक मुफ़्त गोलगप्पे मिलेंगे।"

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रेस का दिन और भोलूराम की 'खटारा' एंट्री

अगली सुबह पहाड़ी चौक पर भारी भीड़ थी। तेज़ सिंह अपनी चमचमाती नीली साइकिल पर सवार होकर गॉगल्स लगाए खड़ा था। तभी दूर से एक आवाज़ आई—कचर-पचर, कचर-पचर!

सबने मुड़कर देखा, भोलूराम अपनी दादाजी के ज़माने की काली साइकिल लेकर आ रहा था। उसकी साइकिल की चेन ढीली थी, गद्दी फटी हुई थी और घंटी की जगह वह खुद मुँह से 'पूँ-पूँ' की आवाज़ निकाल रहा था।

तेज़ सिंह ज़ोर से हँसा, "अरे भोलू! इस खटारा से तू मुझसे मुकाबला करेगा? यह तो झरने तक पहुँचने से पहले ही खुद झरना बन जाएगी!"

भोलूराम ने मासूमियत से कहा, "भाई तेज़ सिंह, साइकिल पुरानी है पर मेरा इरादा नया है। वैसे भी, मुफ़्त गोलगप्पों के लिए तो मैं पैदल भी आ जाता।"

रेस शुरू: रफ़्तार बनाम जुगाड़

जैसे ही सीटी बजी, तेज़ सिंह गोली की रफ़्तार से आगे निकल गया। उसने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। भोलूराम ने धीरे-धीरे पैडल मारना शुरू किया।

रास्ते में एक बहुत बड़ी चढ़ाई थी। तेज़ सिंह ने गियर बदले और तेज़ी से ऊपर चढ़ने लगा। लेकिन पहाड़ी के बीच में ही उसकी महंगी साइकिल का 'सेंसिटिव गियर' मिट्टी फंसने की वजह से जाम हो गया। तेज़ सिंह वहीं रुककर उसे ठीक करने लगा और गुस्से में साइकिल को कोसने लगा।

तभी भोलूराम वहाँ पहुँचा। उसने देखा कि तेज़ सिंह परेशान है। भोलूराम ने अपनी साइकिल रोकी और अपनी जेब से एक 'आलू का पराठा' निकाला। उसने पराठे का थोड़ा सा घी निकाला और तेज़ सिंह के गियर में लगा दिया।

"ये लो भाई, थोड़ा चिकनाहट से काम बन जाएगा," भोलू ने कहा। तेज़ सिंह को शर्म तो आई, पर उसने शुक्रिया कहा और फिर से तेज़ी से आगे निकल गया। उसे लगा कि वह फिर से जीत जाएगा।

शॉर्टकट का तर्क और भोलू की सूझबूझ

आगे चलकर रास्ता दो हिस्सों में बँट गया। एक रास्ता लंबा और पक्का था, दूसरा रास्ता जंगल के बीच से छोटा पर पथरीला था। तेज़ सिंह ने सोचा, "मेरी साइकिल तो स्पोर्ट्स वाली है, मैं लंबे रास्ते से तेज़ी से निकल जाऊँगा।"

भोलूराम ने दिमाग लगाया। उसने देखा कि जंगल वाले रास्ते पर बहुत सारे 'महुआ' के फल गिरे हुए हैं, जिससे ज़मीन फिसलन भरी है। उसने अपनी साइकिल के टायरों पर पुरानी बोरी के टुकड़े लपेट लिए ताकि पकड़ बनी रहे और वह जंगल के छोटे रास्ते से चल पड़ा।

इधर तेज़ सिंह लंबे रास्ते पर तेज़ी से जा रहा था, लेकिन तभी उसे रास्ते में एक 'भेड़ों का झुंड' मिल गया। हज़ारों भेड़ें सड़क जाम करके खड़ी थीं। तेज़ सिंह चिल्लाता रहा, घंटी बजाता रहा, पर भेड़ें कहाँ हटने वाली थीं! उसे वहीं आधा घंटा इंतज़ार करना पड़ा।

जीत की रेखा और गोलगप्पों की खुशबू

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उधर भोलूराम जंगल के रास्ते से, अपनी बोरी बंधे टायरों के साथ, मजे से झरने के पास पहुँच गया। जब वह फिनिश लाइन के पास पहुँचा, तो उसने देखा कि वहाँ अभी तक कोई नहीं आया था।

भोलूराम आराम से फिनिश लाइन पार कर गया और वहाँ रखी कुर्सी पर बैठकर गोलगप्पों का इंतज़ार करने लगा। दस मिनट बाद तेज़ सिंह पसीने में लथपथ, हाँफते हुए पहुँचा। उसने देखा कि भोलूराम पहले से ही वहाँ बैठा मुस्कुरा रहा है।

पूरा शहर चिल्ला उठा—"भोलूराम जीत गया! भोलूराम ही असली सिकंदर है!"

तेज़ सिंह ने अपना सिर झुका लिया और बोला, "भोलू, तुम्हारे पास न गियर थे, न रफ़्तार। फिर तुम कैसे जीत गए?"

भोलू ने हँसते हुए कहा, "भाई तेज़ सिंह, रफ़्तार सड़क पर काम आती है, पर दिमाग हर जगह। तुमने मशीनों पर भरोसा किया, मैंने अपनी परिस्थिति और थोड़े से आलू के पराठे पर। अंत में तो जो जीता वही सिकंदर कहलाता है!"

निष्कर्ष: सादगी और समझदारी की जीत

उस दिन के बाद तेज़ सिंह का घमंड टूट गया। उसने भोलूराम को अपना दोस्त बना लिया और अपनी महंगी साइकिल का रखरखाव खुद करना सीखा। भोलूराम को एक साल तक मुफ़्त गोलगप्पे मिले, लेकिन उसने वे सब अकेले नहीं खाए, बल्कि पूरे शहर के बच्चों के साथ बाँटकर खाए।

गोलगप्पापुर में अब लोग यह जान गए थे कि जीत केवल महँगे सामान से नहीं, बल्कि शांत दिमाग और नेक नीयत से मिलती है।

कहानी की सीख (Moral of the Story)

यह कहानी हमें सिखाती है कि "उपकरणों से ज्यादा महत्वपूर्ण उनका उपयोग करने वाला दिमाग होता है।" कभी भी अपने संसाधनों या ताकत पर घमंड नहीं करना चाहिए। सफलता उन्हें मिलती है जो मुश्किल समय में घबराने के बजाय अपनी बुद्धिमानी (Logic) का इस्तेमाल करते हैं और अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखते हैं। याद रखें, तरीका चाहे जो भी हो, अगर आपकी नीयत साफ़ है और आप पहले लक्ष्य तक पहुँचते हैं, तो दुनिया आपको ही विजेता मानेगी।

सिकंदर महान और उनकी जीत की कहानियों के बारे में और अधिक जानने के लिए आप सिकंदर महान - विकिपीडिया देख सकते हैं।

Image Prompts for Character Consistency (16:9, 2D Digital Illustration)

Prompt 1 (The Starting Line):

A funny 2D digital illustration for a children's book, 16:9 aspect ratio. On the left, a boastful boy named Tej Singh in professional cycling gear and a shiny blue high-tech mountain bike. On the right, a chubby, cheerful boy named Bholuram with a wide smile, riding an old, rusty black vintage bicycle with a torn seat. The setting is a colorful village square called 'Golgappapur' with mountains in the background. Vibrant, high-contrast colors, whimsical storybook art style.

Prompt 2 (The Victory Moment):

A triumphant and humorous 2D digital illustration, 16:9 aspect ratio. Bholuram (consistent design: chubby, cheerful, old black bike) is casually crossing a red finish line near a beautiful waterfall. He is holding a plate of 'Golgappas' in one hand while steering with the other. In the distance, Tej Singh is seen arriving late, looking exhausted and surprised. Forest animals and village kids are cheering. Bright, sunny lighting and professional storybook style.

Story Thumbnail Prompt (16:9, 2D Digital Illustration)

Prompt: A high-energy 2D digital illustration for a story thumbnail, 16:9 aspect ratio. The image shows a split screen or a dynamic race: on one side, a fast blur of a blue sports bike, and on the other, the simple boy Bholuram on his old black bike, overtaking him with a wink. The background features a giant plate of Golgappas as the trophy. Large, bold text saying "जो जीता वही सिकंदर" in Hindi. Catchy colors like orange, bright yellow, and sky blue to attract kids.

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