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अंधेरे का डर: आरव और जूडो चैंपियन

क्या आपको भी अंधेरे का डर सताता है? पढ़िए आरव की यह मजेदार और प्रेरणादायक कहानी, जहाँ एक स्कूल ट्रिप ने बदल दी उसकी जिंदगी और भगा दिया उसका डर।

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अंधेरे का डर: शहर के एक पॉश इलाके में 'आरव' नाम का एक लड़का रहता था। आरव अपने स्कूल का सबसे होनहार छात्र था। वह पढ़ाई में अव्वल आता था, क्रिकेट के मैदान में चौके-छक्के लगाता था और डिबेट कॉम्पिटिशन में अच्छे-अच्छों की बोलती बंद कर देता था। उसके माता-पिता और उसकी छोटी बहन 'ईशा' को छोड़कर किसी को नहीं पता था कि यह 'सुपरबॉय' आरव रात होते ही भीगी बिल्ली बन जाता है।

आरव को अंधेरे का डर (Fear of Darkness) बुरी तरह सताता था। विज्ञान की भाषा में इसे 'नेक्टोफोबिया' (Nyctophobia) कहते हैं, लेकिन आरव के लिए यह किसी मुसीबत से कम नहीं था। उसे अंधेरे कमरे में जाने से तो डर लगता ही था, यहाँ तक कि कम रोशनी में भी उसका दम घुटने लगता था। इसी वजह से उसका परिवार पिछले कई सालों से सिनेमा हॉल में फिल्म देखने भी नहीं गया था।

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आरव का कमरा बहुत सुंदर और हवादार था, लेकिन वह वहां कभी अकेले नहीं सोता था। रात होते ही वह अपना तकिया उठाकर अपनी छोटी बहन ईशा के कमरे में घुस जाता था। ईशा को इससे बहुत चिढ़ होती थी, क्योंकि आरव को सोने के लिए पूरी रात एक तेज रोशनी वाला बल्ब जलाकर रखना पड़ता था।

आरव खुद भी अपनी इस कमजोरी से परेशान था। वह अक्सर खुद से पूछता, "आखिर अंधेरे में ऐसा क्या है जिससे मैं डरता हूँ? भूत? राक्षस? नहीं, वह तो जानता था कि ये सब कहानियों में होते हैं।" फिर भी, जैसे ही बत्ती गुल होती, आरव की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती।

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टेलीस्कोप और छत का खौफ

एक शनिवार की शाम, आरव के पापा ऑफिस से आते समय एक बड़ा सा डिब्बा लेकर आए। उसमें एक 'टेलीस्कोप' (दूरबीन) बनाने का सामान था। आरव को गैजेट्स जोड़ने का बहुत शौक था। रविवार की पूरी सुबह आरव और उसके पापा ने मिलकर पेंच कसे, लेंस लगाए और दोपहर तक एक शानदार टेलीस्कोप तैयार कर लिया।

आरव बहुत खुश था। वह दिन भर उस टेलीस्कोप से दूर की इमारतों और पक्षियों को देखता रहा। लेकिन उसे अंदाज़ा नहीं था कि जिस यंत्र को बनाने में उसे इतना मज़ा आ रहा है, वही रात को उसकी मुसीबत बनने वाला है। रात के खाने के बाद पापा ने उत्साह से कहा, "चलो बच्चों! अब हम छत पर चलेंगे और इस टेलीस्कोप से चाँद और तारों की दुनिया देखेंगे।"

यह सुनते ही आरव के पसीने छूट गए। छत पर? वह भी रात के घने अंधेरे में? आरव ने बहाने बनाने की कोशिश की, लेकिन पापा नहीं माने। वे उसे लगभग जबरदस्ती छत पर ले गए। पापा को लगा कि जब आरव आसमान में चमकते तारों और ग्रहों को देखेगा, तो उसका अंधेरे का डर अपने आप गायब हो जाएगा।

लेकिन छत पर पहुँचकर उल्टा ही हुआ। आरव की नज़र आसमान के तारों पर कम और छत के कोनों में छिपे अंधेरे पर ज्यादा थी। हवा चलने से पास के पीपल के पेड़ के पत्ते हिल रहे थे और 'सर-सर' की डरावनी आवाज़ कर रहे थे। आरव ने डरते हुए पापा से पूछा, "पापा, यह आवाज़ कैसी है?" पापा ने लापरवाही से कहा, "अरे कुछ नहीं, शायद कोई बिल्ली या गिरगिट होगा।"

आरव का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसे हर परछाई में कोई राक्षस दिखाई दे रहा था। आधे घंटे के अंदर ही उसकी हालत इतनी खराब हो गई कि पापा को गुस्सा आ गया। वे निराश होकर नीचे आ गए। आरव ने चैन की सांस ली, लेकिन उसे खुद पर बहुत शर्म आ रही थी।

पिकनिक का फरमान और आरव की घबराहट

कुछ दिनों बाद स्कूल में एक नई मुसीबत आ खड़ी हुई। आरव की क्लास टीचर मिस सोफिया क्लास में आईं और एक बड़ी घोषणा की। "बच्चों! अगले हफ्ते हम सब 'सतपुड़ा के जंगलों' में एडवेंचर कैंप (Adventure Camp) के लिए जा रहे हैं। यह ट्रिप दो दिन और दो रात की होगी। सबको आना अनिवार्य है!"

पूरी क्लास खुशी से झूम उठी। बच्चे डेक्स बजाने लगे और योजनाओं में खो गए। लेकिन आरव का चेहरा सफेद पड़ गया। दो रातें? वह भी जंगल के घने अंधेरे में? घर से दूर? यह सोचकर ही उसके पेट में मरोड़ उठने लगे।

उस रात डिनर टेबल पर आरव ने अपना सबसे गंभीर चेहरा बनाया और पापा से कहा, "पापा, मुझे लगता है मुझे कैंप पर नहीं जाना चाहिए। मेरी पढ़ाई का नुकसान होगा। मैं घर पर रहकर गणित की प्रैक्टिस करना चाहता हूँ।"

पापा तुरंत समझ गए कि यह पढ़ाई का नहीं, बल्कि डर का बहाना है। उन्होंने सख्ती से कहा, "बिल्कुल नहीं! पढ़ाई बाद में भी हो सकती है। दोस्तों के साथ बाहर जाने से जीवन जीने का तरीका आता है। तुम जा रहे हो, और यह मेरा आखिरी फैसला है।"

आरव समझ गया कि अब बचने का कोई रास्ता नहीं है।

जंगल का सफर और साथी का चुनाव

आखिरकार वह दिन आ ही गया। बस में सभी बच्चे अंताक्षरी खेल रहे थे, चिप्स खा रहे थे और मस्ती कर रहे थे। आरव खिड़की वाली सीट पर चुपचाप बैठा अपनी जैकेट की जेब में रखी हनुमान चालीसा को कसकर पकड़े हुए था। उसे लग रहा था कि जैसे वह किसी सजा को काटने जा रहा है।

शाम को वे जंगल के बीच बने एक कैंपसाइट पर पहुँचे। वहां लगभग 30-40 छोटे-छोटे तंबू (Tents) लगे हुए थे। टीचर ने कहा, "बच्चों, हर तंबू में दो लोग रहेंगे। अपना-अपना साथी (Partner) चुन लो।"

आरव ने पहले से ही सोच रखा था कि उसे किसके साथ रहना है। उसने क्लास के सबसे ताकतवर लड़के 'विक्रम' को चुना। विक्रम स्कूल का 'जूडो चैंपियन' था। बच्चे उसे 'बाघ' (Tiger) कहते थे क्योंकि वह किसी से नहीं डरता था। आरव ने सोचा, "अगर मैं विक्रम के साथ रहूँगा, तो अंधेरे में कोई भूत या जानवर मेरे पास आने की हिम्मत नहीं करेगा।" विक्रम ने आरव के साथ रहने के लिए 'हाँ' तो कर दी, लेकिन उसके चेहरे पर भी थोड़ी चिंता की लकीरें थीं, जिन पर आरव ने ध्यान नहीं दिया।

तंबू की वो रात

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रात हुई। जंगल में सन्नाटा छा गया, बस झींगुरों की आवाज़ आ रही थी। कैंपफायर के बाद सभी बच्चे अपने-अपने तंबू में सोने चले गए। आरव और विक्रम भी अपने स्लीपिंग बैग्स में घुस गए। आरव ने अपनी छोटी सी लालटेन जला रखी थी। वह इंतज़ार कर रहा था कि विक्रम कब सोएगा ताकि वह भी सोने की कोशिश करे।

काफी देर हो गई, लेकिन विक्रम ने अपनी करवट नहीं बदली। अचानक, आरव को एक अजीब सी आवाज़ सुनाई दी। जैसे कोई कांप रहा हो। "आरव... आरव..." विक्रम की फुसफुसाती हुई आवाज़ आई। आरव चौंक गया। उसने देखा कि स्कूल का सबसे बहादुर लड़का, जूडो चैंपियन विक्रम, अपने स्लीपिंग बैग में बुरी तरह कांप रहा है।

"क्या हुआ विक्रम? तुम ठीक तो हो?" आरव ने पूछा। विक्रम ने डरते हुए कहा, "भाई... क्या तुम्हें अंधेरे का डर लगता है? क्या हम यह लालटेन पूरी रात जली रख सकते हैं? मुझे... मुझे अंधेरे से बहुत डर लगता है।"

डर का अंत और नई दोस्ती

आरव को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। वह लड़का जिसे पूरा स्कूल 'बाघ' कहता था, वह अंधेरे से डर रहा था? अचानक आरव को एक अजीब सी शक्ति महसूस हुई। उसने देखा कि विक्रम उससे भी ज्यादा डरा हुआ है। यह देखकर आरव का खुद का डर कहीं गायब हो गया। उसे लगा कि अब उसे विक्रम को संभालना है।

आरव अपने स्लीपिंग बैग से उठकर बैठ गया और मुस्कुराने लगा। उसने विक्रम के कंधे पर हाथ रखा और बड़े भाई की तरह बोला, "अरे दोस्त! तुम तो सच में डरपोक निकले। कोई बात नहीं, डरो मत। मैं हूँ न यहाँ। जब तक मैं जाग रहा हूँ, कोई अंधेरा तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। तुम मेरा हाथ पकड़ लो और आराम से सो जाओ।"

विक्रम ने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया। उसे बहुत राहत मिली। उसने पूछा, "तुम हँस क्यों रहे हो? किसी को बताना मत कि मैं डरता हूँ।" आरव ने मुस्कुराते हुए कहा, "फिक्र मत करो। तुम्हारी हालत देखकर मुझे अपना एक पुराना दोस्त याद आ गया जो बिल्कुल तुम्हारे जैसा था। लेकिन अब वह नहीं डरता।"

उस रात, आरव ने जाना कि जब हम किसी और की मदद करने के लिए आगे आते हैं, तो हमारा अपना डर खत्म हो जाता है। वह पहली बार बिना डर के, घने जंगल में, सुकून की नींद सोया।

वापसी में, आरव एक बदला हुआ लड़का था। उसने न केवल एक सच्चा दोस्त पाया था, बल्कि अपने सबसे बड़े दुश्मन 'अंधेरे' को भी हरा दिया था।

इस कहानी से सीख (Moral of the Story):

  1. डर केवल मन का वहम है: असल में अंधेरे में कुछ नहीं होता, यह सिर्फ हमारी कल्पना है।

  2. मदद करने से हिम्मत मिलती है: जब हम दूसरों को सहारा देते हैं, तो हम खुद सबसे ज्यादा मजबूत महसूस करते हैं।

  3. कोई भी पूर्ण (Perfect) नहीं है: हर किसी को किसी न किसी चीज से डर लगता है, चाहे वह कितना भी बहादुर क्यों न दिखे। 

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Tags: Fear of Darkness Stories, Kids Moral Stories, Hindi Kahaniya, Friendship Stories, Lotpot Kids

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