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भारत के एक बहुत ही खूबसूरत और रंगीले राज्य में 'चंदनपुर' नाम का एक नगर हुआ करता था। इस नगर के लोग बहुत खुशमिज़ाज थे। चंदनपुर में एक बहुत ही मशहूर इंसान रहते थे, जिन्हें पूरा नगर प्यार से 'चचा छक्कन' कहता था। चचा छक्कन के पास दौलत तो नहीं थी, लेकिन उनके पास दिमाग का ऐसा खजाना था कि बड़े-बड़े विद्वान भी उनके सामने पानी भरते थे।
चचा छक्कन की सबसे बड़ी खूबी थी उनका हास्य (Humour)। वे किसी भी मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति को अपने चुटकुलों और समझदारी से हल्का कर देते थे। उनकी चचा छक्कन की हाजिर जवाबी के किस्से दूर-दूर तक मशहूर थे।
उसी नगर में एक 'सेठ धनीराम' भी रहता था। नाम तो धनीराम था, लेकिन वह नंबर एक का कंजूस मक्खीचूस था। अगर उसकी मुट्ठी से कोई सिक्का गिर जाए, तो वह उसे ढूंढने के लिए पूरा घर खोद डालता था। वह लोगों को ऊंचे ब्याज पर पैसे देता और फिर उन्हें परेशान करता था।
मजबूरी का कर्ज और सेठ की धमकी
एक बार चंदनपुर में भारी सूखा पड़ा। चचा छक्कन की खेती बिल्कुल बर्बाद हो गई। घर चलाने के लिए चचा को मजबूरी में सेठ धनीराम से 500 सोने के सिक्के उधार लेने पड़े। चचा ने वादा किया था कि वे फसल अच्छी होते ही पैसे लौटा देंगे।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। अगली फसल भी अच्छी नहीं हुई और चचा समय पर उधार नहीं चुका पाए। सेठ धनीराम का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह रोज़ चचा के घर के बाहर आकर चिल्लाता और उन्हें बेइज्ज़त करने की कोशिश करता।
"ओ छक्कन! मेरे पैसे कब दोगे? तुमने तो मुझे कंगाल कर दिया!" सेठ धनीराम रोज़ यही रट लगाता। चचा बहुत शांति से जवाब देते, "सेठ जी, थोड़ा सब्र रखिए। मैं आपका एक-एक पैसा चुका दूँगा। बस थोड़ा वक्त और दे दीजिए।" लेकिन सेठ कहाँ मानने वाला था। उसने तय किया कि वह सीधे राजा के दरबार में जाकर चचा की शिकायत करेगा।
राजा वीरेंद्र सिंह का दरबार
चंदनपुर के राजा 'वीरेंद्र सिंह' बहुत ही न्यायप्रिय थे। उनके दरबार में रोज़ लोगों की फरियाद सुनी जाती थी। एक दिन सुबह-सुबह, सेठ धनीराम रोता-धोता राजा के दरबार में पहुँच गया।
"दुहाई हो महाराज! दुहाई हो!" सेठ ने ज़मीन पर लेटकर नाटक करते हुए कहा। राजा ने पूछा, "क्या हुआ सेठ धनीराम? तुम इतने परेशान क्यों हो?"
सेठ ने हाथ जोड़कर कहा, "महाराज! उस चचा छक्कन ने मुझे लूट लिया है। उसने कई महीनों पहले मुझसे 500 सोने के सिक्के बतौर कर्ज़ लिए थे, लेकिन आज तक नहीं लौटाए। जब भी पैसे मांगता हूँ, तो टाल देता है। मेरी आपसे दरख्वास्त (गुज़ारिश) है कि बिना किसी देरी के मुझे मेरा पैसा वापस दिलाया जाए!"
राजा वीरेंद्र सिंह को चचा छक्कन के बारे में पता था। उन्हें यह मजेदार कहानियां सुनने में बहुत आनंद आता था। उन्होंने तुरंत अपने सिपाहियों को भेजा और चचा छक्कन को दरबार में हाज़िर होने का आदेश दिया।
बेफिक्र चचा की दरबार में एंट्री
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कुछ ही देर में चचा छक्कन दरबार में पहुँच गए। उनके चेहरे पर कोई शिकन या डर नहीं था। वे बिल्कुल बेफिक्री से, अपनी मूंछों पर ताव देते हुए राजा के सामने खड़े हुए।
राजा ने थोड़ी सख्त आवाज़ में पूछा, "छक्कन! क्या सेठ धनीराम सच कह रहा है? क्या तुमने इससे पैसे उधार लिए हैं और अब चुका नहीं रहे हो?"
चचा ने अदब से सिर झुकाया और बहुत ही मीठी आवाज़ में बोले, "जहाँपनाह! सेठ जी बिल्कुल 16 आने सच कह रहे हैं। मैं यह बात कुबूल करता हूँ कि मैंने इनसे 500 सिक्के लिए थे। और हुज़ूर, मैं कोई बेईमान इंसान नहीं हूँ। मैं इनका उधार चुकाने का पूरा इरादा रखता हूँ।"
सेठ धनीराम बीच में ही बोल पड़ा, "इरादे से क्या होता है? मुझे मेरे पैसे अभी चाहिए!"
चचा की चाल और सेठ का फँसना
चचा छक्कन ने एक गहरी सांस ली और बहुत ही मासूमियत से राजा की तरफ देखकर कहा, "महाराज! मैं बहुत ही शरीफ आदमी हूँ। मैं सेठ जी का कर्ज चुकाने के लिए कुछ भी कर सकता हूँ। अगर जरूरत पड़ी, तो मैं अपनी प्यारी 'गाय' और अपना शानदार 'घोड़ा' दोनों बाज़ार में बेच दूँगा, लेकिन इनका एक-एक पैसा चुका दूँगा।"
चचा के मुँह से 'गाय और घोड़ा' शब्द सुनते ही सेठ धनीराम की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। उसे पता था कि चचा के घर में एक चूहा तक नहीं है, गाय और घोड़ा तो बहुत दूर की बात है। सेठ को लगा कि चचा राजा को बेवकूफ बना रहे हैं और समय मांग रहे हैं।
सेठ धनीराम से रहा नहीं गया। वह गुस्से में लाल होकर ज़ोर से चिल्लाया, "झूठ! यह सफ़ेद झूठ बोल रहा है हुज़ूर! इसके पास न तो कोई गाय है और न ही कोई घोड़ा! अरे महाराज, इसके घर में तो खाने के लिए अन्न का एक दाना नहीं है। इसके पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं है, यह गाय और घोड़ा कहाँ से बेचेगा!"
पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। सेठ को लगा कि उसने चचा का झूठ पकड़ लिया है और अब राजा चचा को कड़ी सजा देंगे।
हाजिर जवाबी का मास्टरस्ट्रोक
लेकिन चचा छक्कन तो यही चाहते थे! जैसे ही सेठ ने यह बात बोली, चचा के चेहरे पर एक चतुर मुस्कान आ गई।
चचा ने तुरंत राजा की ओर देखा और हाथ जोड़कर बोले, "जहाँपनाह! अब आप ही इंसाफ कीजिए। जब यह सेठ खुद अपने मुँह से कह रहा है और जानता है कि मेरी हालत इतनी खराब है, मेरे पास न गाय है, न घोड़ा है और न ही एक फूटी कौड़ी है... तो फिर यह मुझसे 'तुरंत' और 'बिना देरी के' अपने पैसे कैसे मांग सकता है? जब मेरे पास आज खाने को ही कुछ नहीं है, तो मैं इसे आज ही पैसे कहाँ से दूँगा?"
चचा की यह बात सुनकर पूरे दरबार में सन्नाटा एक पल के लिए गहरा हुआ, और फिर...
ठहाकों से गूंजा दरबार
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राजा वीरेंद्र सिंह को चचा की यह बात इतनी तार्किक (Logical) और मज़ेदार लगी कि वे अपनी गद्दी पर बैठकर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। "हा-हा-हा! वाह छक्कन वाह! तुम्हारी बातों का सच में कोई जवाब नहीं।"
दरबार के बाकी मंत्री भी अपनी हँसी नहीं रोक पाए। चतुर बीरबल की कहानी की तरह ही आज चचा छक्कन ने अपनी हाज़िर जवाबी से सबका दिल जीत लिया था।
सेठ धनीराम अपना मुँह खुला का खुला रह गया। उसे समझ आ गया कि वह खुद ही अपने खोदे हुए गड्ढे में गिर गया है। अपनी ही बात बोलकर उसने साबित कर दिया था कि चचा अभी पैसे नहीं दे सकते।
राजा ने हँसी रोकते हुए फैसला सुनाया, "सेठ धनीराम, छक्कन की बात में दम है। जब तुम खुद जानते हो कि उसकी हालत अभी ठीक नहीं है, तो तुम उस पर ज़ुल्म नहीं कर सकते। मैं छक्कन को उसकी फसल अच्छी होने तक का और समय देता हूँ। तब तक तुम उसे परेशान नहीं करोगे।"
इस तरह मामला रफा-दफा हो गया। अपनी चचा छक्कन की हाजिर जवाबी और सूझबूझ से उन्होंने एक बार फिर खुद को बड़ी मुसीबत से बचा लिया और सेठ को खाली हाथ लौटना पड़ा।
बच्चों, यह प्रेरणादायक कहानी हमें सिखाती है कि मुसीबत के समय घबराना नहीं चाहिए, बल्कि शांति और अकल से काम लेना चाहिए।
इस कहानी से सीख (Moral of the Story):
दिमाग की ताकत: शारीरिक ताकत या पैसे से ज्यादा बड़ी ताकत इंसान की 'बुद्धि' और 'हाज़िर जवाबी' होती है।
गुस्सा बेवकूफी है: सेठ धनीराम ने गुस्से में आकर बिना सोचे-समझे सच बोल दिया और अपना ही नुकसान कर लिया।
मुसीबत में शांति: कठिन परिस्थितियों में घबराने के बजाय अगर हम ठंडे दिमाग से सोचें, तो हर समस्या का हल निकल सकता है।
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