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कैसे पड़ा शेखचिल्ली का नाम? बचपन की मजेदार और हंसाने वाली कहानी

क्या आपको पता है कि अपनी मूर्खता के लिए मशहूर शेखचिल्ली का नाम 'शेखचिल्ली' कैसे पड़ा? जानिए उनके बचपन की इस लोटपोट कर देने वाली मजेदार हिंदी कहानी में।

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शेखचिल्ली :- बच्चों, आपने अपनी दादी-नानी से बहुत सी मजेदार कहानियां सुनी होंगी। जब भी किसी ऐसे इंसान की बात होती है जो ख्याली पुलाव पकाता है या बिना सिर-पैर की बातें करता है, तो हम उसे तुरंत 'शेखचिल्ली' कह देते हैं।

शेखचिल्ली (Sheikh Chilli) भारतीय लोक कथाओं का एक बहुत ही मशहूर और हास्य से भरा किरदार है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उनका यह अजीबोगरीब नाम 'शेखचिल्ली' कैसे पड़ा? क्या उनके माता-पिता ने उनका यह नाम रखा था? बिल्कुल नहीं! आइए, आज आपको उनके बचपन के दिनों में ले चलते हैं और बताते हैं कि आखिर यह नाम कैसे पड़ा।

गरीब परिवार और माँ का सपना

बहुत पुरानी बात है, एक छोटे से गाँव में एक गरीब परिवार रहता था। इस परिवार में एक छोटा सा लड़का था, जिसका असली नाम सिर्फ 'शेख' था। जब शेख बहुत छोटा था, तभी उसके सिर से पिता का साया उठ गया था। उसकी माँ ने बहुत ही लाड़-प्यार और मेहनत से उसे पाल-पोस कर बड़ा किया था।

शेख की माँ अक्सर सोचती थीं, "मेरा बेटा बड़ा होकर खूब पढ़ेगा-लिखेगा, कुछ बड़ा काम करेगा और हमारी सारी गरीबी दूर कर देगा।" माँ की आँखों में बेटे के लिए बहुत से सपने थे। जब शेख थोड़ा बड़ा हुआ, तो उसकी माँ ने उसे गाँव के ही एक मदरसे (स्कूल) में पढ़ने के लिए भेज दिया।

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मदरसे की पढ़ाई और शेख का दिमाग

मदरसे में सभी बच्चे उसे 'शेख' ही कहकर बुलाते थे। शेख दिल का बहुत अच्छा था, लेकिन उसका दिमाग पढ़ाई में कम और ख्यालों में ज्यादा दौड़ता था। वह बातों का कुछ का कुछ मतलब निकालने में माहिर था।

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एक दिन मदरसे में मौलवी साहब बच्चों को व्याकरण (Grammar) पढ़ा रहे थे। उन्होंने बच्चों को समझाया, "देखो बच्चों, भाषा में लड़का और लड़की (पुल्लिंग और स्त्रीलिंग) के लिए अलग-अलग शब्दों का इस्तेमाल होता है। जैसे अगर लड़का खाना खा रहा है, तो कहेंगे 'लड़का खाता है'। और अगर लड़की है, तो कहेंगे 'लड़की खाती है'।" मौलवी साहब ने एक और उदाहरण दिया, "रहमान जा रहा है... रजिया जा रही है।"

शेख ने इस बात को बड़े ध्यान से सुना। उसने अपने दिमाग में यह गणित बैठा लिया कि अगर लड़के के लिए शब्द के अंत में 'ता' या 'रा' आता है, तो लड़की के लिए उसी शब्द के अंत में 'ती' या 'री' आना चाहिए। यह ज्ञानवर्धक कहानी यहीं से एक बहुत ही मज़ेदार मोड़ लेने वाली थी।

कुएं के पास का हादसा और शेख की दौड़

उसी दिन दोपहर के समय, मदरसे की छुट्टी के बाद शेख अपने दोस्तों के साथ गाँव के एक पुराने कुएं के पास खेल रहा था। अचानक, खेलते-खेलते गाँव की एक छोटी लड़की का पैर फिसला और वह छपाक से कुएं में गिर गई!

गनीमत यह थी कि कुएं में पानी कम था और लड़की एक उभरे हुए पत्थर को पकड़कर लटक गई, लेकिन वह बहुत बुरी तरह डर गई थी। वह कुएं के अंदर से जोर-जोर से मदद के लिए आवाज़ लगाने लगी— "बचाओ! बचाओ!"

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शेख ने जब यह देखा, तो वह घबरा गया। वह तुरंत अपने दोस्तों को बुलाने के लिए दौड़ा। वह हांफता हुआ दोस्तों के पास पहुँचा और हाथ नचाते हुए बोला, "अरे दोस्तों! जल्दी चलो! वह लड़की कुएं में गिर गई है और वह मदद के लिए बहुत जोर-जोर से 'चिल्ली' रही है!"

दोस्त हैरान रह गए। "क्या कर रही है?" शेख ने फिर पूरे आत्मविश्वास से कहा, "अरे भाई! वह कुएं में है और बहुत जोर से 'चिल्ली' रही है! जल्दी चलो!" दोस्त उसकी 'चिल्ली' वाली बात समझ तो नहीं पाए, लेकिन वे समझ गए कि कोई बड़ी मुसीबत है। वे सब भागकर कुएं के पास गए और गाँव वालों की मदद से एक रस्सी डालकर उस रोती हुई लड़की को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

हँसी के ठहाके और नामकरण

जब लड़की बाहर आ गई और सबने राहत की सांस ली, तो शेख लड़की को दिलासा देते हुए बोला, "देखो, अब ठीक है न? कितनी जोर से चिल्ली रही थी तुम!"

शेख के एक दोस्त ने अपना सिर खुजाते हुए पूछा, "अरे शेख! तू बार-बार यह 'चिल्ली-चिल्ली' क्या लगा रखा है? यह 'चिल्ली' क्या होता है?"

शेख ने अपना सीना चौड़ा किया और मदरसे में सीखी हुई विद्या का बखान करते हुए बोला, "अरे बुद्धू! तूने आज मौलवी साहब की बात ध्यान से नहीं सुनी थी क्या? लड़का होता है तो हम कहते हैं 'लड़का चिल्ला रहा है' या 'चिल्ला मत'। अब चूँकि कुएं में गिरने वाली एक 'लड़की' थी, तो मैं उसे 'चिल्ला' कैसे कह सकता हूँ? व्याकरण के हिसाब से तो वह 'चिल्ली' ही रही थी न!"

शेख का यह अतरंगी व्याकरण और तर्क सुनकर वहाँ मौजूद सभी लड़के ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। "हा-हा-हा! लड़का चिल्लाता है तो लड़की चिल्ली रही है? वाह रे शेख!"

उस दिन के बाद से, लड़कों ने शेख की इस अजीबोगरीब सोच और मासूम मूर्खता को पकड़ लिया। जब भी वह आता, सब उसे चिढ़ाने के लिए कहते, "अरे देखो, चिल्ली-चिल्ली आ गया!" धीरे-धीरे गाँव भर में उसका असली नाम 'शेख' के साथ 'चिल्ली' जुड़ गया और वह हमेशा के लिए 'शेखचिल्ली' बन गया।

सबसे मज़ेदार बात तो यह थी कि शेख को कभी यह बात समझ ही नहीं आई कि लोग उस पर हँस क्यों रहे हैं। उसने कभी अपने इस नए नाम का बुरा नहीं माना और हमेशा अपनी ही मस्त दुनिया में खुश रहा। यही कारण है कि शेखचिल्ली की हिंदी कहानियां आज भी हमें लोटपोट कर देती हैं।

इस कहानी से सीख (Moral of the Story):

  • अधूरा ज्ञान खतरनाक है: शेख ने मदरसे में बात तो सुनी, लेकिन उसे सही से नहीं समझा। बिना पूरी तरह समझे किसी बात को लागू करने से हंसी का पात्र बनना पड़ता है।

  • हंसमुख स्वभाव: शेखचिल्ली की तरह हमें भी छोटी-छोटी बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए और जिंदगी में मस्त रहना चाहिए।

  • मदद के लिए हमेशा तैयार रहें: भाषा जो भी हो, मुसीबत के समय शेख ने तुरंत दौड़कर अपने दोस्तों को बुलाया और लड़की की जान बचाई, जो एक बहुत अच्छा काम था। 

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