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स्वर्ग से आए मेहमान या ठग? चतुर मंत्री ने खोला राज़ | Funny Story

क्या पैसे देकर स्वर्ग की सीट बुक हो सकती है? पढ़िए 'दो फ़रिश्ते' की यह गुदगुदाने वाली कहानी जहाँ चतुर मंत्री ने अपनी सूझबूझ से दो ढोंगी साधुओं को नानी याद दिला दी।

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अक्सर हम अंधविश्वास में पड़कर अपना नुकसान कर बैठते हैं। यह कहानी 'विजयनगर' जैसे ही एक खुशहाल राज्य 'रतनपुर' की है। वहां के राजा भोलेनाथ (जैसा नाम, वैसा काम) बहुत सीधे थे। एक दिन उनके दरबार में Do Farishte (दो फ़रिश्ते) आए, जिन्होंने दावा किया कि वे सीधे स्वर्ग से उतरे हैं। राजा तो उनकी बातों में आ गए, लेकिन राज्य के चतुर मंत्री सुमित को दाल में कुछ काला नज़र आया। फिर जो हुआ, वह हँसी और अक्लमंदी का एक बेहतरीन नमूना है।

कहानी: स्वर्ग की सीढ़ी और मंत्री का जाल

दरबार में 'चमत्कारी' मेहमान

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रतनपुर के राजा भोलेनाथ का दरबार लगा हुआ था। अचानक, दरबार के मुख्य द्वार पर तेज रोशनी हुई (जो असल में आतिशबाजी थी) और धुएं के बीच से दो अजीबोगरीब लोग प्रकट हुए।

उन्होंने सफ़ेद और चमकीले कपड़े पहन रखे थे। उनकी पीठ पर गत्ते (Cardboard) के बने बड़े-बड़े पंख चिपके थे, जिन पर मुर्गियों के सफ़ेद पंख लगाए गए थे। उनके सिर पर एक तार से बढ़ा हुआ गोल चक्र (Halo) था, जो बैटरी वाले बल्ब से चमक रहा था।

वे चलते नहीं थे, बल्कि ऐसे उछल-उछल कर आ रहे थे जैसे धरती पर पैर रखने से उन्हें करंट लग रहा हो। दरबार में सन्नाटा छा गया। उनमें से एक बोला, "हे नश्वर राजा! हम स्वर्गलोक से आए हैं। हम दो फ़रिश्ते हैं—मेरा नाम है 'पुण्य कुमार' और ये हैं मेरे साथी 'धर्म दास'।"

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राजा भोलेनाथ सिंहासन से खड़े हो गए। "अरे वाह! साक्षात फ़रिश्ते! पधारिये महाराज! आपका स्वागत है।"

'पुण्य कुमार' ने हाथ उठाया और नाटकीय ढंग से कहा, "राजन, भगवान ने हमें एक 'स्पेशल ऑफर' देकर भेजा है। स्वर्ग में अभी 'मरम्मत' चल रही है और कुछ नई सीटें बन रही हैं। जो भी हमें 100 सोने की मोहरें देगा, हम उसके लिए स्वर्ग में 'विंडो सीट' बुक कर देंगे।"

राजा और दरबारी यह सुनकर बहुत खुश हुए। "विंडो सीट! वाह!" राजा ने तुरंत खजांची को आदेश दिया, "इन महात्माओं की सेवा में कोई कमी न रहे। इन्हें शाही मेहमानखाने में ठहराया जाए और कल हम अपनी सीट बुक करेंगे।"

मंत्री सुमित का शक

पूरा दरबार खुश था, लेकिन मंत्री सुमित (जो तेनालीराम की तरह ही हाजिरजवाब थे) कोने में खड़े मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने देखा कि 'धर्म दास' नाम का फरिश्ता, शाही थाली में रखे लड्डू को बड़े चाव से घूर रहा है और बार-बार अपनी नकली मूंछें ठीक कर रहा है।

सुमित समझ गए कि ये कोई फ़रिश्ते नहीं, बल्कि पक्के ठग हैं। उन्होंने राजा को समझाने की कोशिश की, "महाराज, फ़रिश्ते सोने की मोहरें क्यों मांगेंगे? वहां तो सब कुछ मुफ़्त होता है।" राजा ने डांट दिया, "सुमित! तुम हमेशा शक करते हो। ये दैवीय मेहमान हैं। इनका अपमान मत करो।"

सुमित ने सोचा, "सीधी उंगली से घी नहीं निकलेगा। इन फ़रिश्तों को इनकी ही भाषा में समझाना होगा।"

दावत और 'दिव्य' परीक्षा

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अगले दिन, सुमित ने उन दोनों फ़रिश्तों को अपने घर दावत पर बुलाया। "हे दिव्य आत्माओं! राजा मोहरें तो देंगे ही, पर पहले मेरे घर का भोजन ग्रहण करें," सुमित ने आग्रह किया।

दोनों ठग खुश हो गए। वे सुमित के घर पहुंचे। सुमित ने उनके सामने सोने की थालियां सजाईं। लेकिन थालियों में खाने के बजाय सुलगते हुए अंगारे (Burning Coal) और कंकड़-पत्थर रखे थे।

'पुण्य कुमार' चीखा, "यह क्या मज़ाक है? हम क्या पत्थर खाते हैं?" सुमित ने भोलेपन से हाथ जोड़े, "प्रभु! मैंने शास्त्रों में पढ़ा है कि फ़रिश्ते धरती का अन्न नहीं खाते, क्योंकि उससे उनका 'दिव्य तेज' कम हो जाता है। वे तो सिर्फ़ अग्नि और वायु का सेवन करते हैं। इसलिए मैंने ताज़े-ताज़े अंगारे परोसे हैं।"

'धर्म दास' को गुस्सा आ गया। "तुम हमारा मज़ाक उड़ा रहे हो? हम राजा से तुम्हारी शिकायत करेंगे कि तुमने फ़रिश्तों का अपमान किया!"

सुमित मुस्कुराया, "अरे नहीं प्रभु! अगर आपको यह पसंद नहीं, तो मैं दूसरा 'दिव्य भोजन' लाता हूँ।" सुमित अंदर गया और एक बड़ा थैला ले आया। उसने थैले में से जूते और चप्पल निकाले। "यह लीजिये। मैंने सुना है, स्वर्ग जाने के लिए पापों का नाश करना पड़ता है। अगर आप ये जूते खा लेंगे, तो मेरे सारे पाप धुल जाएंगे।"

दोनों ठग समझ गए कि मंत्री बहुत टेढ़ा है। वे वहां से भागने की कोशिश करने लगे। लेकिन सुमित ने पहले ही दरवाज़ा बाहर से बंद करवा दिया था।

उड़ने की परीक्षा (The Flying Test)

अगले दिन दरबार लगा। दोनों ठग राजा के पास रोते हुए पहुंचे। "राजन! आपके मंत्री ने हमारा अपमान किया है। हम अभी स्वर्ग वापस जा रहे हैं और भगवान से कहकर आपका 'बुकिंग' कैंसिल करवा देंगे।"

राजा घबरा गए। "अनर्थ हो गया! सुमित, माफ़ी मांगो!" सुमित ने कहा, "महाराज, मैं माफ़ी मांग लूंगा। लेकिन ये जाने की बात कर रहे हैं, तो क्यों न हम इनका विदाई समारोह (Farewell) मनाएं?"

सुमित ने प्रस्ताव रखा, "ये फ़रिश्ते हैं, इनके पास पंख हैं। ये दरवाज़े से क्यों जाएंगे? हम इन्हें महल की सबसे ऊंची मीनार (Tower) से विदा करेंगे। ये वहां से उड़कर सीधे बादलों में चले जाएंगे। हम सब नीचे से हाथ हिलाएंगे। कितना दिव्य नज़ारा होगा!"

राजा को यह विचार बहुत पसंद आया। "वाह! क्या बात है! चलो मीनार पर।" दोनों ठगों के पसीने छूट गए। उनके पंख तो गत्ते के थे! अगर मीनार से कूदे तो सीधे यमराज के पास पहुंचेंगे, स्वर्ग नहीं।

वे मीनार की बालकनी पर पहुंचे। नीचे पूरी प्रजा खड़ी थी। सुमित ने कहा, "प्रभु, अब उड़ान भरिये। हम देख रहे हैं।"

'पुण्य कुमार' ने नीचे झांका और चक्कर खाकर गिर पड़ा। 'धर्म दास' ने सुमित के पैर पकड़ लिए। "मंत्री जी! हमें माफ़ कर दो! हम कोई फ़रिश्ते नहीं हैं। हम तो पड़ोस के गाँव के नटखट और बंटी हैं। हमने कर्ज़ चुकाने के लिए यह नाटक किया था।"

पोल खुली और राजा की हँसी

राजा भोलेनाथ हैरान रह गए। उन्होंने देखा कि पसीने की वजह से 'फ़रिश्ते' की नकली मूंछ निकलकर उसकी थोड़ी पर लटक गई है। सुमित ने हँसते हुए कहा, "महाराज, देखिये! धरती की गर्मी से इनका 'दिव्य रूप' पिघल रहा है।"

राजा को अपनी मूर्खता पर हँसी आ गई। उन्होंने अपनी चप्पल निकाली और हँसते हुए कहा, "सुमित, तुमने सही कहा था। इन्हें सोने की मोहरें नहीं, बल्कि मेरे 'शाही जूतों' की ज़रूरत है।"

राजा ने उन दोनों को कारागार में डालने के बजाय, उनसे पूरे शहर की सफ़ाई करवाने की सज़ा दी। उन्होंने कहा, "जब तक तुम सचमुच के 'नेक इंसान' (फ़रिश्ते) नहीं बन जाते, तब तक राज्य की सेवा करो।"

निष्कर्ष: अक्ल बड़ी या भैंस?

उस दिन के बाद राजा ने कसम खाई कि वे बिना जांच-पड़ताल के किसी पर भरोसा नहीं करेंगे। और मंत्री सुमित? वे अपनी अक्लमंदी के लिए और भी मशहूर हो गए। नटखट और बंटी भी मेहनत करके सुधर गए।

इस कहानी से सीख (Moral)

इस कहानी से हमें यह गुदगुदाती हुई सीख मिलती है:

  1. तर्क का प्रयोग: कोई भी चमत्कार या दावा आँख मूंदकर नहीं मानना चाहिए। "तर्क की कसौटी पर जो खरा उतरे, वही सच है।"

  2. पाखंड से बचें: वेशभूषा बदलने से इंसान का चरित्र नहीं बदलता।

Wikipedia Link

अधिक जानकारी के लिए देखें: तेनाली रामा - विकिपीडिया

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