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भारत के इतिहास में विजयनगर साम्राज्य का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। वहां के राजा 'कृष्णदेव राय' बहुत ही प्रतापी और कला प्रेमी थे। उनके दरबार में आठ महान विद्वान थे जिन्हें 'अष्टदिग्गज' कहा जाता था। इन सबमें सबसे खास और सबसे चतुर थे—तेनाली रामा (Tenali Rama) । तेनालीराम अपनी हाज़िरजवाबी और पैनी नज़र के लिए पूरे राज्य में मशहूर थे।
एक सुहानी सुबह, महाराज कृष्णदेव राय का दरबार लगा हुआ था। सभी मंत्री अपने-अपने काम का ब्यौरा दे रहे थे। तभी द्वारपाल ने आकर सूचना दी, "महाराज की जय हो! एक विदेशी यात्री आपसे मिलने की अनुमति मांग रहा है।" राजा ने तुरंत उसे अंदर बुलाने का आदेश दिया।
रहस्यमयी यात्री 'जालंधर' का प्रवेश
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दरबार का मुख्य द्वार खुला और एक बेहद दुबला-पतला, लेकिन अजीब सी चमकती आँखों वाला व्यक्ति अंदर आया। उसने अजीब से रंग-बिरंगे कपड़े पहने हुए थे। उसने महाराज को झुककर प्रणाम किया और बहुत ही मीठी आवाज़ में बोला, "महाराज कृष्णदेव राय की जय हो! मेरा नाम 'जालंधर' है। मैं सुदूर 'मायादेश' का रहने वाला हूँ। मैं पूरी दुनिया का भ्रमण कर चुका हूँ और अब आपके महान राज्य के दर्शन करने आया हूँ।"
महाराज कृष्णदेव राय को नए लोगों से मिलने और दुनिया की अनोखी बातें जानने का बहुत शौक था। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "जालंधर, हमारे विजयनगर में तुम्हारा स्वागत है। आज से तुम हमारे शाही मेहमान हो।"
राजा से सम्मान पाकर जालंधर की बांछें खिल गईं। उसने अपनी चालाकी दिखाते हुए कहा, "महाराज! मैंने दुनिया भर के कई जादू देखे हैं। लेकिन क्या आपने कभी स्वर्ग की 'परियों' को धरती पर नाचते देखा है? मेरे पास एक ऐसी जादुई विद्या है, जिससे मैं रातों-रात सुंदर परियों को यहाँ बुला सकता हूँ।"
'परियां' शब्द सुनते ही पूरे दरबार में कानाफूसी होने लगी। महाराज भी आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने उत्सुकता से पूछा, "क्या यह सच है जालंधर? क्या तुम हमें परियों का दर्शन करा सकते हो?"
रात का गुप्त निमंत्रण
जालंधर ने रहस्यमयी अंदाज़ में आवाज़ धीमी करते हुए कहा, "जी महाराज! लेकिन वे परियां बहुत शर्मीली होती हैं। वे भीड़-भाड़ में नहीं आतीं। अगर आप आज आधी रात को नगर के बाहर स्थित 'कमल सरोवर' (Lotus Lake) के पास बने पुराने खंडहर में अकेले आएं, तो मैं वहां अपनी जादुई विद्या से परियों का दरबार सजा दूँगा।"
महाराज कृष्णदेव राय जादू और चमत्कारों के बहुत शौकीन थे। बिना कुछ सोचे-समझे उन्होंने जालंधर की यह शर्त मान ली। लेकिन दरबार में एक व्यक्ति ऐसा था जिसकी आँखों से जालंधर का कोई भी झूठ छिप नहीं सका। वह थे हमारे तेनालीराम! तेनालीराम ने ध्यान से देखा था कि जालंधर बात करते समय बार-बार अपनी कमर पर हाथ रख रहा था, जैसे वहां कोई हथियार छिपा हो। उसकी चाल-ढाल किसी यात्री की नहीं, बल्कि किसी प्रशिक्षित सैनिक जैसी थी।
तेनालीराम का संदेह और गुप्त योजना
दरबार खत्म होने के बाद तेनालीराम सीधे अपने घर नहीं गए। उन्होंने अपने कुछ भरोसेमंद गुप्तचरों को बुलाया। तेनालीराम ने कहा, "मुझे इस विदेशी यात्री पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। यह परियों की कहानी सुनाकर महाराज को फंसाने की कोशिश कर रहा है। तुम लोग तुरंत उस 'कमल सरोवर' के खंडहरों की जांच करो और वहां छिप जाओ।"
बुद्धिमानी का तकाज़ा यही था कि महाराज को सीधे मना करने के बजाय, दुश्मन को रंगे हाथों पकड़ा जाए। तेनालीराम ने राजा की सुरक्षा का पूरा इंतज़ाम कर लिया था।
आधी रात का सन्नाटा और खौफनाक जाल
रात का अंधेरा गहरा चुका था। आसमान में चाँद बादलों के पीछे छिपा था। महाराज कृष्णदेव राय अपने सबसे तेज़ घोड़े पर सवार होकर, बिना किसी सैनिक के अकेले कमल सरोवर की तरफ निकल पड़े।
सरोवर के किनारे स्थित उस पुराने और डरावने किले के पास जालंधर पहले से ही खड़ा राजा का इंतज़ार कर रहा था। महाराज घोड़े से उतरे और बोले, "जालंधर! मैं आ गया हूँ। बताओ, तुम्हारी परियां कहाँ हैं?"
जालंधर के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई। उसने कहा, "आइए महाराज, परियां अंदर तहखाने में आपका इंतज़ार कर रही हैं।" जैसे ही महाराज उस अंधेरे खंडहर के अंदर जाने के लिए मुड़े, अचानक उन्हें पीछे से हथियारों के खनकने और भारी जूतों की आवाज़ सुनाई दी।
राजा ने चौंककर पीछे मुड़कर देखा। न कोई परी थी, न कोई जादुई दरबार! बल्कि जालंधर को शाही सेना के जवानों ने चारों तरफ से घेर कर रस्सियों से बांध दिया था।
तेनालीराम की शानदार एंट्री
महाराज अभी कुछ समझ ही पाते कि किले के एक पुराने खंभे के पीछे से तेनालीराम बाहर निकले। महाराज ने हैरानी से पूछा, "तेनालीराम! तुम यहाँ इतनी रात को क्या कर रहे हो? और तुमने हमारे शाही मेहमान को क्यों बांध रखा है?"
तेनालीराम ने मुस्कुराते हुए कहा, "क्षमा करें महाराज! लेकिन यह कोई विदेशी यात्री या जादूगर नहीं है। यह हमारे पड़ोसी दुश्मन राज्य का सेनापति है। इसके कपड़ों के अंदर खतरनाक खंजर छिपे हैं। अंदर कोई परियां नहीं हैं महाराज, बल्कि यह तो आपको अकेले में लाकर जान से मारने की खौफनाक साज़िश थी।"
जालंधर का सिर शर्म और डर से झुक गया। उसकी सारी चालाकी धरी की धरी रह गई। महाराज कृष्णदेव राय के पसीने छूट गए। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ कि वे कैसे एक अजनबी की बातों में आकर अपनी जान खतरे में डाल चुके थे।
महाराज का धन्यवाद और सीख
महाराज ने तेनालीराम के कंधे पर हाथ रखा और गहरी सांस लेते हुए कहा, "तेनालीराम! आज तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारे जैसा रत्न मेरे दरबार में दूसरा कोई नहीं। लेकिन तुम्हें इस साज़िश का पता कैसे चला?"
तेनालीराम ने हँसते हुए जवाब दिया, "महाराज! जब यह दरबार में मीठी-मीठी बातें कर रहा था, तब मैंने इसके कड़क जूतों और हाथों के निशानों पर गौर किया, जो सिर्फ एक तलवारबाज़ के हो सकते हैं। और भला कोई परी इस कलयुग में खंडहरों में नाचने क्यों आएगी? इसलिए मैंने पहले ही अपने सैनिकों को यहाँ तैनात कर दिया था।"
राजा ने तेनालीराम की चतुराई पर खुश होकर उन्हें अपने गले से लगाया और अगले दिन दरबार में उन्हें ढेर सारे सोने के सिक्कों से पुरस्कृत किया।
बच्चों, लोटपोट की ये हिंदी कहानियां हमें हमेशा कुछ न कुछ नया सिखाती हैं।
इस कहानी से सीख (Moral of the Story):
लालच और अंधविश्वास: कभी भी किसी अनजान व्यक्ति की लुभावनी बातों या चमत्कारों पर आँख मूंदकर विश्वास नहीं करना चाहिए।
सतर्कता (Alertness): तेनालीराम की तरह हमें भी हमेशा अपनी आँख और कान खुले रखने चाहिए ताकि हम खतरे को समय रहते पहचान सकें।
बुद्धि ही सबसे बड़ा हथियार है: शारीरिक बल से ज्यादा, तेज दिमाग बड़ी से बड़ी मुसीबत से बचा सकता है। यह एक सच्ची प्रेरणादायक कहानी है।
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