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अपने मुँह मियाँ मिट्ठू: जब चिक्कू तोते की शेखी ने उसे फँसा दिया

पढ़िए 'अपने मुँह मियाँ मिट्ठू' मुहावरे पर आधारित बच्चों के लिए एक प्रेरणादायक जंगल कहानी। जानिए कैसे चिक्कू तोते की आत्म-प्रशंसा ने उसे मुश्किल में डाल दिया।

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अपने मुँह मियाँ मिट्ठू: नीलगिरी का घना जंगल वैसे तो बहुत शांत था, लेकिन वहाँ एक पक्षी ऐसा था जिसके शोर से पूरा जंगल परेशान रहता था। वह था चिक्कू तोता। चिक्कू दिखने में वाकई बहुत खूबसूरत था—उसके पंख पन्ने जैसे हरे थे, उसकी चोंच गाजरी लाल थी और उसके सिर पर एक छोटा सा पीले रंग का कलगी जैसा निशान था, जो उसे दूसरे तोतों से अलग बनाता था।

लेकिन चिक्कू के साथ एक बड़ी समस्या थी। उसे अपनी तारीफ खुद करने की आदत थी। जिसे हिंदी में हम कहते हैं—अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना। वह सुबह सोकर उठता तो सबसे पहले ओस की बूंदों में अपना चेहरा देखता और कहता, "वाह चिक्कू! तेरे जैसा सुंदर तो इस पूरे नीलगिरी वन में कोई नहीं है। कोयल की आवाज़ अच्छी होगी, पर उसका रंग तो देखो, बिल्कुल कोयला! और मोर? उसके पंख तो भारी हैं, मेरी तरह तेज़ी से उड़ थोड़े ही सकता है।"

चिक्कू की आत्म-प्रशंसा और जंगल के जानवर

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जंगल के बाकी जानवर चिक्कू की इन बातों से तंग आ चुके थे। एक दोपहर, जब बरगद के पेड़ के नीचे 'गज्जू' हाथी आराम कर रहा था और 'बंभी' खरगोश गाजर चबा रहा था, चिक्कू वहाँ उड़कर आया।

वह एक नीची टहनी पर बैठकर अपनी चोंच को साफ़ करने लगा और बोला, "गज्जू भाई, तुमने सुना? कल मैंने बादलों से भी ऊपर उड़ान भरी थी। चील तो बस नाम की मशहूर है, असल में तो ऊँचाइयों का राजा मैं हूँ। और बंभी, तुम्हारी दौड़ तो बस ज़मीन तक है, काश तुम देख पाते कि आसमान से यह जंगल कैसा दिखता है, जैसा कि सिर्फ मैं देख सकता हूँ।"

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बंभी खरगोश ने एक लंबी आह भरी और कहा, "चिक्कू, तुम्हारी उड़ान अच्छी है, हम सब जानते हैं। पर हर बात में खुद को सबसे बड़ा बताना ठीक नहीं है। कभी-कभी दूसरों की खूबी भी देखनी चाहिए।"

चिक्कू ने चिढ़कर पंख फड़फड़ाए और बोला, "दूसरों की खूबी? तुम लोग तो मेरी बराबरी कर ही नहीं सकते, इसलिए जलते हो।" यह कहकर वह उड़ गया।

संकट की घड़ी और चिक्कू का दावा

कुछ दिनों बाद, नीलगिरी वन में भीषण सूखा पड़ा। नदियाँ सूखने लगीं और पेड़ों पर फल कम हो गए। जंगल के राजा शेर ने एक सभा बुलाई। सबको खाने और पानी की तलाश के लिए दूर 'नीली घाटी' की ओर जाना था, जिसका रास्ता बहुत कठिन और भूलभुलैया वाला था।

सभा में गज्जू हाथी ने पूछा, "लेकिन हमें रास्ता कौन दिखाएगा? नीली घाटी का रास्ता तो बरसों पुराना है और हममें से कोई वहाँ हाल-फिलहाल में नहीं गया है।"

यही मौका था चिक्कू के लिए। उसने तुरंत उड़कर अपनी जगह बनाई और सीना तानकर बोला, "महाराज! आप चिंता क्यों करते हैं? मैं हूँ न! मेरी आँखें दूरबीन से भी तेज़ हैं और मेरा दिमाग नक्शे जैसा चलता है। मुझे नीली घाटी का रास्ता ज़ुबानी याद है। मैं अकेला पूरे जंगल को वहाँ ले जा सकता हूँ। मुझे किसी की सलाह की ज़रूरत नहीं है।"

सबने चिक्कू पर भरोसा कर लिया, हालांकि 'कालू' कौआ, जो बहुत शांत स्वभाव का था, उसे चिक्कू की बातों पर थोड़ा शक था।

भूलभुलैया भरा रास्ता और चिक्कू की गलती

अगले दिन सुबह-सुबह यात्रा शुरू हुई। चिक्कू सबसे आगे उड़ रहा था और पीछे-पीछे सारे जानवर चल रहे थे। चिक्कू बीच-बीच में पीछे मुड़कर कहता, "देखा? मेरे पीछे चलते रहो, तुम लोग कभी भटक नहीं सकते। मैं तो बचपन में ही जान गया था कि मैं एक महान मार्गदर्शक बनूँगा।"

चलते-चलते रास्ता दो पहाड़ियों के बीच पहुँच गया। वहाँ से तीन अलग-अलग रास्ते निकल रहे थे। चिक्कू ने बिना सोचे-समझे सबसे चमकदार दिखने वाले रास्ते की ओर उड़ान भर दी। जबकि असल में वह रास्ता 'काली खाई' की तरफ जाता था।

कालू कौवे ने धीरे से कहा, "चिक्कू भाई, ज़रा रुकिए। बड़े-बुज़ुर्ग कहते थे कि नीली घाटी के लिए हमेशा पश्चिम की हवा का पीछा करना चाहिए, पर हम तो उत्तर की ओर जा रहे हैं।"

चिक्कू ने ठहाका लगाया, "कालू, तुम अपनी काली बुद्धि अपने पास रखो। क्या तुमने कभी बादलों के ऊपर से रास्ता देखा है? नहीं न? तो चुपचाप मेरे पीछे आओ। मैं चिक्कू हूँ, मैं कभी गलत नहीं हो सकता।"

जब असलियत सामने आई

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दो घंटे और चलने के बाद, जानवर एक ऐसी जगह पहुँच गए जहाँ चारों तरफ ऊँची-ऊँची कंटीली झाड़ियाँ थीं और आगे जाने का कोई रास्ता नहीं था। धूप तेज़ थी और जानवर प्यास से बेहाल थे।

चिक्कू ऊपर उड़कर इधर-उधर देखने लगा, लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि वे कहाँ हैं। उसकी घबराहट बढ़ने लगी। उसने कभी नक्शा देखा ही नहीं था, वह तो बस अपनी तारीफ करने के चक्कर में झूठ बोल गया था।

तभी गज्जू हाथी ने चिंघाड़ते हुए पूछा, "चिक्कू! कहाँ है नीली घाटी? हम तो यहाँ फंस गए हैं।"

चिक्कू की आवाज़ लड़खड़ाने लगी, "अह... वो... बस पास ही है। लगता है पहाड़ थोड़ा खिसक गया है।"

अब जानवरों को समझ आ गया कि चिक्कू सिर्फ 'अपने मुँह मियाँ मिट्ठू' बन रहा था। उसे कुछ नहीं पता था। तभी कालू कौआ आगे आया। उसने पास के एक ऊंचे सूखे पेड़ पर बैठकर हवा की दिशा देखी, मिटटी की गंध पहचानी और कहा, "सब मेरे पीछे आइये, हम गलत दिशा में आ गए हैं।"

कालू ने शांति से, बिना कोई शेखी बघारे, सबको सही रास्ते पर पहुँचा दिया। शाम होते-होते सब नीली घाटी की ठंडी झील के किनारे थे, जहाँ रसीले फलों के पेड़ थे।

चिक्कू का सबक

सब जानवर पानी पीकर और फल खाकर खुश थे। चिक्कू एक कोने में गर्दन झुकाए बैठा था। आज उसकी चमकती चोंच और सिर की पीली कलगी उसे सुंदर नहीं लग रही थी, क्योंकि उसका अहंकार टूट चुका था।

बंभी खरगोश उसके पास गया और बोला, "चिक्कू भाई, अब समझ आया? खुद की तारीफ करने से कोई बड़ा नहीं बनता। अगर आप वाकई काबिल होते, तो आज हमें भटकाते नहीं। असली काबिलियत वह है जिसे दूसरे पहचानें, न कि आप खुद चिल्ला-चिल्ला कर कहें।"

चिक्कू ने अपनी गलती मानी और उस दिन के बाद से उसने अपनी तारीफ खुद करना छोड़ दिया। अब वह दूसरों की मदद करता था और उसकी तारीफ अब पूरा जंगल करता था।


सीख (Moral of the Story):

इंसान को अपनी तारीफ खुद नहीं करनी चाहिए। आपके काम को बोलना चाहिए, आपकी जुबान को नहीं। जो लोग 'अपने मुँह मियाँ मिट्ठू' बनते हैं, अक्सर मुश्किल समय में उनकी पोल खुल जाती है। 

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