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कविता “धरती का आँगन इठलाता” प्रकृति, कृषि और मानव जीवन के गहरे रिश्ते को बेहद संवेदनशील और प्रेरक शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह रचना धरती को केवल भूमि नहीं, बल्कि एक सजीव माँ के रूप में देखती है, जिसके आँगन में जीवन पलता है, संस्कृति फलती है और सभ्यता आगे बढ़ती है। शस्य-श्यामला धरती, स्वर्णिम फसलें और किसान का श्रम. ये सभी मिलकर भारत की आत्मा को परिभाषित करते हैं।
इस कविता में खेती और प्रकृति के साथ मानव के चिरंतन संबंध को उजागर किया गया है। जौ और गेहूँ की बालियाँ केवल अन्न का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि त्याग, परिश्रम और आस्था की पहचान भी हैं। कवि हमें यह संदेश देता है कि बीते युगों की जकड़नों को छोड़कर नए बीज बोने का समय है. विचारों के बीज, सृजन के बीज और सामूहिक जिम्मेदारी के बीज।
यह कविता भारतीय संस्कृति, कृषि पर कविता, प्रकृति प्रेम और वसुधैव कुटुंबकम् जैसे विषयों को मजबूती से छूती है। स्कूलों, साहित्यिक मंचों, कृषि दिवस, पर्यावरण दिवस या राष्ट्रीय पर्वों के लिए यह कविता अत्यंत उपयुक्त है। SEO दृष्टि से भी यह रचना उन पाठकों को आकर्षित करती है जो प्रकृति, भारत और प्रेरणादायक हिंदी कविताओं की खोज में रहते हैं।
कविता
धरती का आँगन इठलाता
धरती का आँगन इठलाता,
शस्य-श्यामला भू का यौवन,
अंतरिक्ष का हृदय लुभाता।
धरती का आँगन इठलाता।
जौ-गेहूँ की स्वर्णिम बाली,
भू का अंचल वैभवशाली।
इस अंचल से चिर अनादि से,
अंतरंग मानव का नाता।
धरती का आँगन इठलाता।
आओ नए बीज हम बोएँ,
विगत युगों के बंधन खोएँ।
भारत की आत्मा का गौरव,
स्वर्गलोक में भी न समाता।
धरती का आँगन इठलाता।
भारत जन रे धरती की निधि,
न्यौछावर उन पर सहृदय विधि।
दाता वे, सर्वस्व दान कर,
उनका अंतर नहीं अघाता।
धरती का आँगन इठलाता।
किया उन्होंने त्याग, तप वरण,
जन-स्वभाव का स्नेह संचरण।
आस्था ईश्वर के प्रति अक्षय,
श्रम ही उनका भाग्य विधाता।
धरती का आँगन इठलाता।
सृजन-स्वभाव से हो उर प्रेरित,
नव श्री-शोभा से उन्मेषित।
हम वसुधैव कुटुंब ध्येय रख,
बनें नए युग के निर्माता।
धरती का आँगन इठलाता।
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