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बचपन की सबसे प्यारी यादों में अगर किसी एक चीज़ का नाम लिया जाए, तो वह झूला ज़रूर होगा। पेड़ की मजबूत डाल से बंधा झूला, हवा के संग हिलता-डुलता, और बच्चों की खिलखिलाहट से भरा हुआ — यही तो बचपन का असली आनंद है। “झूला” कविता इसी मासूम खुशी को शब्दों में पिरोती है।
इस कविता में एक बच्चा अपनी अम्मा से झूला लगाने की विनती करता है। उसके मन में कल्पनाओं की उड़ान है। झूले पर बैठकर वह सिर्फ आगे-पीछे नहीं झूलना चाहता, बल्कि आसमान को छूने का सपना देखता है। यह भाव बच्चों की उस सोच को दर्शाता है, जहाँ हर खेल एक रोमांच होता है और हर कल्पना एक नई दुनिया।
कविता में प्रकृति भी जीवंत हो उठती है। डाली का झूलना, पत्तों का हिलना, और झूले के साथ-साथ पूरे वातावरण का लय में आ जाना बच्चों के मन को आनंद से भर देता है। अंत में “चल दिल्ली, ले चल कोलकाता” जैसी पंक्ति बच्चे की कल्पनाशील सोच को दर्शाती है, जहाँ झूला उसे पूरे देश की सैर करा सकता है।
यह कविता बाल कविता, बचपन की कविताएँ, झूला कविता हिंदी, और बच्चों के लिए सरल कविता जैसे विषयों के लिए बेहद उपयुक्त है। सरल भाषा, लयबद्ध पंक्तियाँ और कल्पनाओं से भरी यह कविता बच्चों को पढ़ने, सुनने और याद करने में बेहद पसंद आएगी।
कविता: झूला
अम्मा आज लगा दे झूला,
इस झूले पर मैं झूलूँगा।
इस पर चढ़कर, ऊपर बढ़कर,
आसमान को मैं छू लूँगा।
झूला झूल रही है डाली,
झूल रहा है पत्ता-पत्ता।
इस झूले पर बड़ा मज़ा है,
चल दिल्ली, ले चल कोलकाता।
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