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Holi Ka Tyohar: एक यादगार होली

क्या होली सिर्फ शोर-शराबा है या आनंद का उत्सव? पढ़िए 'होली का त्योहार' की यह प्यारी कहानी, जहाँ नन्हे रोहन ने अपनी मम्मी को होली का असली मतलब समझाया।

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Holi Ka Tyohar: एक यादगार होली:- होली (Holi) रंगों का त्योहार है, लेकिन कई बार बड़ों की 'सफाई' और 'अनुशासन' की जिद बच्चों की खुशियों पर पानी फेर देती है। यह कहानी है 'गुलमोहर सोसाइटी' के नन्हे रोहन की, जिसकी मम्मी को होली खेलना बिल्कुल पसंद नहीं था। लेकिन एक छोटी सी घटना ने कैसे घर का माहौल बदल दिया और मम्मी को भी रंगों से प्यार हो गया, यह पढ़कर आपका दिल खुश हो जाएगा। यह कहानी Holi Ka Tyohar के असली मायने सिखाती है।

कहानी: रंगों की जीत

होली की सुबह और घर में तनाव

गुलमोहर सोसाइटी में होली की धूम मची हुई थी। हर तरफ "होली है!" का शोर गूंज रहा था। बच्चे, बूढ़े और जवान—सभी रंगों में सराबोर थे। लेकिन सोसाइटी के फ्लैट नंबर 102 में सन्नाटा पसरा था, जो बाहर के शोर से बिल्कुल अलग था।

8 साल का रोहन अपनी नई पिचकारी हाथ में थामे, तैयार होकर दरवाजे पर खड़ा था। उसने सफेद कुर्ता-पायजामा पहन रखा था, जो अभी तक बेदाग था। वह अपने पापा, मिस्टर वर्मा, का इंतज़ार कर रहा था। तभी अंदर से सुधा जी (रोहन की मम्मी) की तेज़ आवाज़ आई।

"मैं कह रही हूँ ना, रोहन कहीं नहीं जाएगा! देखिए बाहर क्या हाल है। सब हुड़दंग मचा रहे हैं। पहले गंदे रंगों से भूत बनो, फिर घंटों बाथरूम में रगड़-रगड़ कर नहाओ। क्या तुक है इस त्योहार का?" सुधा जी गुस्से में थीं।

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मिस्टर वर्मा उन्हें समझाने की कोशिश कर रहे थे, "अरे सुधा, साल में एक बार तो त्योहार आता है। बच्चा है, खेलने दो। सब दोस्त नीचे खेल रहे हैं।"

"नहीं मतलब नहीं! पिछली बार इसकी आँख में रंग चला गया था। और फिर उन कपड़ों के दाग तो छूटते ही नहीं। आप जाइए अगर आपको शौक है, लेकिन मेरा बेटा इस 'गंवारों वाली होली' में शामिल नहीं होगा," सुधा जी ने अपना फैसला सुना दिया।

रोहन की उदासी

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रोहन का दिल बैठ गया। उसकी मुट्ठी में पकड़ी पिचकारी ढीली पड़ गई। वह धीरे से चलकर बालकनी में आ गया। नीचे का नज़ारा देख उसकी आँखें भर आईं। उसके दोस्त—पिंटू, रिया, और आर्यन—एक-दूसरे पर गुलाल उड़ा रहे थे। पानी के गुब्बारे फूट रहे थे और हर तरफ हंसी-ठहाके थे।

रोहन ने सोचा, "क्या सच में होली बुरा त्योहार है? अगर ये इतना ही बुरा है, तो सब इतने खुश क्यों हैं? मम्मी को रंग पसंद नहीं तो वो न खेलें, पर मुझे और पापा को तो जाने दें।"

अंदर मम्मी और पापा की बहस अब भी चल रही थी। सुधा जी सफाई और सेहत के तर्क दे रही थीं, और मिस्टर वर्मा बस असहाय होकर सुन रहे थे। रोहन को लगा कि अब कुछ नहीं हो सकता। उसने अपनी पिचकारी बालकनी के कोने में टिका दी और उदास होकर नीचे देखने लगा।

ढोल की थाप और बदलता माहौल

तभी सोसाइटी के गेट से एक ढोल वाला अंदर आया। ढम-ढम-ढम! ढोल की तेज़ आवाज़ ने पूरे माहौल में बिजली सी दौड़ा दी। बच्चे, जो अब तक सिर्फ रंग लगा रहे थे, अब ढोल की थाप पर नाचने लगे।

"होली खेले रघुवीरा अवध में..." गाने के बोल और ढोल की गूंज फ्लैट नंबर 102 तक भी पहुँची। सुधा जी की बहस रुक गई। मिस्टर वर्मा भी चुप हो गए। दोनों का ध्यान अचानक बालकनी की तरफ गया।

"अरे! रोहन कहाँ गया?" मिस्टर वर्मा ने देखा कि बालकनी खाली थी और पिचकारी जमीन पर पड़ी थी। सुधा जी घबरा गईं। "कहीं नीचे तो नहीं चला गया?" वे दौड़ते हुए बालकनी में आईं और नीचे झांका।

जो नज़ारा उन्होंने देखा, उसने उन्हें हैरान कर दिया।

रोहन का डांस और बेफिक्री

सोसाइटी के पार्क के बीचों-बीच रोहन खड़ा था। नहीं, खड़ा नहीं था—वह नाच रहा था! वही रोहन, जो घर में डरा-सहमा सा था, अब ढोल की बीट पर पूरी मस्ती में थिरक रहा था। उसने बांहें फैला रखी थीं और अपनी ही धुन में मगन था। उसके आसपास बाकी बच्चे घेरा बनाकर तालियां बजा रहे थे।

रोहन के चेहरे पर न कोई डर था, न कपड़े गंदे होने की चिंता। वहां सिर्फ शुद्ध आनंद (Pure Joy) था।

सुधा जी और मिस्टर वर्मा ऊपर से यह सब देख रहे थे। मिस्टर वर्मा ने धीरे से कहा, "सुधा, देखो उसे। पिछले पंद्रह मिनट से हम बहस कर रहे थे और वो उदास था। लेकिन अब देखो, उसके चेहरे की चमक तो देखो।"

सुधा जी कुछ नहीं बोलीं। उनकी नज़रें बस अपने बेटे पर टिकी थीं। उन्होंने देखा कि एक पड़ोसी ने रोहन के गाल पर प्यार से थोड़ा सा गुलाल लगाया और रोहन ने हंसते हुए उसे गले लगा लिया। उस पल सुधा जी को एहसास हुआ कि वह 'सफाई' के चक्कर में अपने बेटे से उसका 'बचपन' छीन रही थीं। होली सिर्फ दागों का त्योहार नहीं, यह तो दिलों के मिलने का त्योहार था।

तभी नाचते-नाचते रोहन की नज़र ऊपर अपनी बालकनी पर पड़ी। उसने देखा मम्मी उसे देख रही हैं। वह एकदम से रुक गया। उसका नाचना बंद हो गया। उसे लगा अब डांट पड़ेगी। वह घबराकर सीढ़ियों की तरफ भागा।

रंगों भरा सरप्राइज़

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रोहन हांपते हुए घर के अंदर घुसा। उसे लगा था कि मम्मी दरवाजे पर गुस्से में खड़ी मिलेंगी। लेकिन जैसे ही उसने लिविंग रूम में कदम रखा, वह हैरान रह गया।

मम्मी के हाथ में उसकी वही पिचकारी थी जो वह बालकनी में छोड़ गया था। और उनके सामने पापा खड़े थे, जो हंस रहे थे। सुधा जी ने पिचकारी का निशाना पापा की तरफ साधा और—पिचकारी चली! लाल रंग की धार सीधे मिस्टर वर्मा के कुर्ते पर जा गिरी।

"अरे वाह! क्या निशाना है!" मिस्टर वर्मा हंसे और उन्होंने पास रखी थाली से गुलाल उठाकर सुधा जी के गालों पर लगा दिया।

रोहन को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। "मम्मी?"

सुधा जी ने रोहन की तरफ देखा। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, प्यार था। उन्होंने पिचकारी रोहन को थमा दी और खुद घुटनों पर बैठकर उसे गले लगा लिया। "सॉरी बेटा," सुधा जी ने कहा, "मैंने तुम्हें बहुत रोका। जाओ, जी भर के होली खेलो। और हाँ..." उन्होंने रोहन की नाक पर थोड़ा सा हरा रंग लगा दिया, "...बुरा न मानो होली है!"

निष्कर्ष: असली होली

रोहन का चेहरा खुशी से चमक उठा। उसने तुरंत पिचकारी भरी और चिल्लाया, "हैप्पी होली!" उस दिन वर्मा परिवार ने जमकर होली खेली। घर गंदा हुआ, कपड़े खराब हुए, लेकिन उस दिन जो यादें बनीं, वे किसी भी दाग से ज्यादा कीमती थीं। मिस्टर वर्मा ने सही कहा था—जो काम वो सालों में नहीं कर पाए, वो रोहन की एक मुस्कान और ढोल की थाप ने कर दिखाया।

इस कहानी से सीख (Moral)

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है:

  1. खुशियाँ सफाई से ज्यादा जरूरी हैं: कभी-कभी हमें नियमों और डर को भूलकर बस पल को जीना चाहिए।

  2. त्योहार जोड़ने के लिए होते हैं: होली का असली मज़ा तब है जब परिवार और समाज एक साथ मिलकर खुशियाँ मनाए।

Wikipedia Link

अधिक जानकारी के लिए देखें: होली - विकिपीडिया

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