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अक्ल बिना नकल: कालू कौवे की खतरनाक छलांग

दूसरों की नकल करने से पहले अपनी क्षमता पहचानें। पढ़िए 'अक्ल बिना नकल' की यह प्रसिद्ध जातक कथा, जहाँ एक घमंडी कौवे ने मछली पकड़ने के चक्कर में जान गंवा दी। (Best Hindi Moral Story)

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दोस्तों, इंटरनेट पर आप अक्सर Hindi Moral Stories या Jataka Tales ढूँढते हैं, जो हमें जीवन जीने का सही तरीका सिखाती हैं। आज की कहानी भी उसी खजाने से निकली एक अनमोल रत्न है। हम अक्सर दूसरों की सफलता देखकर उनकी नकल (Imitation) करने की कोशिश करते हैं। हम सोचते हैं, "अगर वो कर सकता है, तो मैं क्यों नहीं?" लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि हर किसी की बनावट और हुनर अलग होता है। यह कहानी 'सुंदरवन' के पास स्थित एक झील की है, जहाँ कालू नाम के एक कौवे ने अपनी प्रकृति के खिलाफ जाकर कुछ ऐसा करने की कोशिश की, जिसका परिणाम बहुत दुखद हुआ। यह Akl Bina Nakal की कहानी आपको सिखाएगी कि बिना सोचे-समझे किसी को कॉपी करना कितना भारी पड़ सकता है।

कहानी: अकाल, दोस्ती और विनाशकारी घमंड

 सूखा और भूख का तांडव

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एक समय की बात है, 'हरित प्रदेश' नाम का एक राज्य हुआ करता था। वहां के खेत हमेशा हरे-भरे रहते थे। लेकिन कुदरत हमेशा एक जैसी नहीं रहती। उस साल बारिश की एक बूंद भी नहीं गिरी। सूरज आग उगलने लगा और ज़मीन फट गई। नदियाँ सूख गईं और खेतों में खड़ी फसलें जलकर राख हो गईं।

इंसानों के साथ-साथ पक्षियों पर भी आफत आ गई। कालू कौवा और उसकी पत्नी गोरी, जो गाँव के पास एक पीपल के पेड़ पर रहते थे, दाने-दाने को मोहताज हो गए। पहले उन्हें घरों से रोटी के टुकड़े मिल जाते थे, लेकिन अब जब इंसानों के पास ही खाने को नहीं था, तो पक्षियों को कौन पूछता?

कालू ने अपनी पत्नी से कहा, "गोरी, यहाँ रहे तो भूख से मर जाएंगे। सुना है जंगल के उस पार एक बड़ी झील है—नील सरोवर। वहां शायद कुछ खाने को मिल जाए।" दोनों ने भारी मन से अपना पुराना घर छोड़ा और जंगल की ओर उड़ चले।

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जलज की दुनिया

लंबी उड़ान के बाद वे 'नील सरोवर' के पास पहुंचे। यह झील अभी पूरी तरह नहीं सूखी थी। उसके बीच में गहरा पानी था। कालू और गोरी ने झील के किनारे एक सूखे पेड़ पर अपना नया बसेरा (New Home) बना लिया।

उस झील में जलज नाम का एक जलकौवा (Cormorant/Water Crow) रहता था। जलज देखने में कालू जैसा ही काला था, लेकिन उसकी गर्दन लंबी थी और पंख पानी में तैरने के लिए बने थे। जलज पानी का उस्ताद था। वह दिन भर पानी में डुबकी लगाता, मछलियां पकड़ता और मज़े से खाता। शाम को वह पानी की सतह पर पंख फैलाकर ऐसे नाचता मानो कोई राजा हो।

कालू पेड़ की डाल पर बैठा यह सब देखता रहता। उसके पेट में चूहे दौड़ रहे थे। उसने सोचा, "अरे वाह! यह जलकौवा तो मज़े में है। एक बार में चार-चार मछलियां गटक जाता है। हम यहाँ सूखे टुकड़े ढूँढ रहे हैं और यह दावत उड़ा रहा है। अगर मैं इससे दोस्ती कर लूँ, तो मेरा काम बन जाएगा।"

मतलब की दोस्ती

अगली सुबह, कालू उड़कर झील के किनारे एक पत्थर पर जा बैठा जहाँ जलज आराम कर रहा था। कालू ने अपनी आवाज़ में जितनी मिठास हो सकती थी, उतनी भरी और बोला, "मित्र! नमस्कार! मैं कालू हूँ। मैंने कल तुम्हें मछली पकड़ते देखा। क्या गज़ब की फुर्ती है तुम्हारी! पानी में तो तुम बिजली की तरह चलते हो। मान गए भाई!"

अपनी तारीफ सुनकर जलज खुश हो गया। वह सीधा-सादा पक्षी था। उसने कहा, "धन्यवाद मित्र! मैं जलज हूँ। कहो, कैसे आना हुआ?"

कालू ने दीन-हीन चेहरा बनाया, "मित्र, अकाल ने हमें बर्बाद कर दिया है। मुझे भी मछली पकड़ने का बहुत शौक है, लेकिन मुझे सही तकनीक नहीं आती। अगर तुम मुझे यह कला (Skill) सिखा दो, तो हम भी पेट भर सकें।"

जलज हँसा, "अरे मित्र! मछली पकड़ना कोई आसान काम नहीं। इसके लिए पानी में सांस रोकने और तैरने का अभ्यास चाहिए। तुम थल-पक्षी (Land Bird) हो। तुम क्यों कष्ट करते हो? हम दोस्त हैं, मैं तुम्हारे लिए मछलियां पकड़ दिया करूँगा।"

कालू तो यही चाहता था। उस दिन के बाद से कालू की मौज हो गई। जलज रोज़ मेहनत करता, ढेर सारी मछलियां पकड़ता। वह खुद भी खाता और कालू के लिए भी बड़ी-बड़ी मछलियां किनारे पर रख देता। कालू उन्हें उठाता और अपनी पत्नी गोरी के साथ मिलकर दावत उड़ाता।

घमंड का नशा

दिन बीतते गए। बैठे-बिठाए खाकर कालू के शरीर में चर्बी और दिमाग में घमंड (Arrogance) चढ़ने लगा। एक दिन मछलियां खाते हुए उसने सोचा, "आखिर इस जलज में ऐसा क्या खास है? रंग मेरा भी काला है, चोंच मेरी भी नुकीली है, और पंख मेरे भी हैं। यह पानी में घुसकर मछली लाता है, मैं भी ला सकता हूँ। मैं कब तक इस जलकौवे की दया पर पलूँगा? मुझे भी स्वाभिमान से जीना चाहिए।"

असल में, यह स्वाभिमान नहीं, अभिमान था। कालू ने तय कर लिया कि अब वह खुद शिकार करेगा। उसे लगा कि मछली पकड़ना बच्चों का खेल है—बस पानी में कूदो और चोंच मारकर बाहर आ जाओ।

 चेतावनी और अनसुनी

अगले दिन सुबह, जब जलज शिकार के लिए जाने वाला था, कालू ने उसे रोका। "मित्र जलज, आज तुम रहने दो। आज मैं खुद मछली पकड़कर दिखाऊंगा।"

जलज हैरान रह गया। "कालू, तुम होश में तो हो? तुम पानी में नहीं तैर सकते। झील के नीचे बहुत काई (Algae) और जड़ें हैं। तुम फंस जाओगे। मेरी बात मानों, यह ज़िद छोड़ दो।"

कालू ने अकड़ कर गर्दन घुमाई, "तुम क्या समझते हो? सिर्फ़ तुम ही यह कर सकते हो? यह तुम नहीं, तुम्हारा अहंकार बोल रहा है कि मैं तुमसे कम हूँ। आज मैं तुमसे बड़ी मछली पकड़कर लाऊंगा।"

जलज ने बहुत समझाया, "दोस्त, यह Short Story नहीं, ज़िंदगी का सवाल है। नकल के लिए भी अक्ल चाहिए होती है।" लेकिन विनाश काले विपरीत बुद्धि। कालू ने एक न सुनी।

 मौत की छलांग

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कालू ने उड़ान भरी। उसने हवा में एक चक्कर लगाया और एक बड़ी मछली को निशाना बनाया। "जय हो!" चिल्लाते हुए कालू ने पानी में छपाक से डाइव लगा दी।

वह पानी के अंदर तो चला गया, लेकिन उसके पंख पानी में भीगते ही भारी हो गए। वह जिस मछली को पकड़ने गया था, वह तो सरक गई। कालू ने ऊपर आने के लिए पंख फड़फड़ाए, लेकिन यह क्या? झील की तलहटी में जमी हुई मोटी काई (Weeds) में उसके पंजे और चोंच उलझ गए।

कालू ने ज़ोर लगाया, लेकिन वह जितना हिलता, काई का जाल उसे उतना ही कसता जाता। जलज ऊपर से चिल्ला रहा था, "कालू! शांत रहो! हिलना बंद करो!" लेकिन कालू घबराहट में हाथ-पांव मारता रहा। पानी उसकी नाक और मुंह में भरने लगा। उसका दम घुटने लगा। उसे अपनी पत्नी गोरी और जलज की चेतावनी याद आई, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

थोड़ी ही देर में, पानी शांत हो गया। कालू का शरीर काई के जाल में हमेशा के लिए कैद हो गया।

दुखद अंत

शाम तक जब कालू नहीं लौटा, तो गोरी उसे ढूंढते हुए झील किनारे आई। वहां जलज उदास बैठा था। गोरी ने पूछा, "भैया, आपके मित्र कहाँ हैं?"

जलज की आँखों में आंसू आ गए। उसने कहा, "बहन, कालू ने बिना अक्ल के नकल की। वह भूल गया था कि वह ज़मीन का राजा है और मैं पानी का। उसने मेरी बराबरी करने के चक्कर में अपने प्राण गंवा दिए। मैंने उसे बहुत रोका था, पर घमंड ने उसके कान बंद कर दिए थे।"

गोरी रोती रह गई। उसे समझ आ गया कि कुदरत ने जिसे जैसा बनाया है, उसे उसी में खुश रहना चाहिए और अपनी सीमाओं को पहचानना चाहिए।

इस Hindi Kahani से हमें यह समझ आता है कि प्रेरणा लेना अच्छी बात है, लेकिन आँख बंद करके किसी की नकल करना बेवकूफी है। हर किसी का टैलेंट अलग होता है। मछली पेड़ पर नहीं चढ़ सकती और बंदर पानी में सांस नहीं ले सकता। अपनी ताकत को पहचानो, नकलची मत बनो।

इस कहानी से सीख (Moral of the Story)

इस कहानी से हमें दो महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं:

  1. नकल में भी अक्ल चाहिए: किसी के काम को आसान समझकर उसे बिना सीखे करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

  2. अपनी सीमाएं पहचानें: हमें अपनी क्षमताओं और सीमाओं का आदर करना चाहिए।

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