Jungle Story: नाम स्मरण की महिमा

गजराज हाथीदादा को जब भी अपने दैनिक निजी कार्यों से फुरसत होती तो तुरन्त ही नमो भगवते वासुदेवाय का मंत्र जपना शुरू कर देते थे। कभी किसी ने उन्हें व्यर्थ में समय गंवाते नहीं देखा था। उनका मन सदा ईश्वर में एकाग्र रहता था।

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नाम स्मरण की महिमा

Jungle Story नाम स्मरण की महिमा:- गजराज हाथीदादा को जब भी अपने दैनिक निजी कार्यों से फुरसत होती तो तुरन्त ही नमो भगवते वासुदेवाय का मंत्र जपना शुरू कर देते थे। कभी किसी ने उन्हें व्यर्थ में समय गंवाते नहीं देखा था। उनका मन सदा ईश्वर में एकाग्र रहता था। (Jungle Stories | Stories)

आज उन्हें मिलने जंगल के इंस्पेक्टर शेरू बाघ मामा आये हैं। शेरू बाघ से सारा जंगल डरता था। उन्हें सब साष्टांग दंडवत प्रणाम करते थे। बाघ मामा हाथीदादा का बड़ा आदर करते थे, क्योंकि वे जानते थे कि हाथीदादा कितने बड़े महात्मा हैं।, कितने गुणवान हैं। इसलिए जब कभी उनके जीवन में दुःख आता, तकलीफ आती या किसी समस्या का हल नहीं मिल रहा हो, तब अंततः हाथीदादा के पास ही जाते। हाथीदादा उन्हें तरोताज़ा कर देते। उन्हें संतुष्ट करके घर भेज देते।

‘‘हाथीदादा, राम-राम!’’ शेरू बाघ मामा हाथीदादा को प्रमाण करते हैं। हाथीदादा उनको देखकर धीरे से मुस्कुराते हैं।

‘‘आइये, आइये, इंस्पेक्टर साहब! बहुत दिनों के बाद पधारे। आपकी तबियत तो ठीक है न?’’ (Jungle Stories | Stories)

इस प्रकार थोड़ी इधर-उधर की बातें होती हैं। थोड़ा हिचकिचाते हुए बाघ मामा अपने मूल मुद्दे पर आते हैं। हाथीदादा का इतना सरल परोपकारी व्यक्तित्व था कि कोई भी अपनी समस्या उनके सामने रख सके।

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‘‘हाथीदादा! मुझे एक विचित्र सा रोग हो गया है, मुझे आपको कष्ट देना अच्छा नहीं लग रहा है...

‘‘हाथीदादा! मुझे एक विचित्र सा रोग हो गया है, मुझे आपको कष्ट देना अच्छा नहीं लग रहा है। पर यदि कोई दवा मिल जाती तो बड़ी अच्छी बात होगी। बात ऐसी है कि मुझे हर दिन लोगों के साथ गाली-गलोच करनी पड़ती है। अपराधियों के साथ मार-पीट करनी पड़ती है। ऐसा लगातार करते रहने से मेरा स्वभाव कड़क, उग्र जैसा हो गया है। थोड़ी भी उल्टी बात हुई कि दिमाग गरम हो जाता है। तुरन्त ही मुंह से अभद्र शब्द निकल पड़ते हैं। सामने वाला तो सुनकर चला जाता है। लेकिन वे क्रूर शब्द मेरे दिमाग में घूमते रहते हैं। अभी मेरा स्वभाव ही ऐसा हो गया है कि साधारण बातचीत में भी मुंह से गालियां आ जाती हैं। इससे मुझे बड़ा कष्ट होता है आपसे थोड़ा बहुत गीता का ज्ञान जो पाया है। उससे समझा है कि अपशब्द बोलना, असत्य बोलना, दूसरों को कष्टदायी वचन कहना, व्यर्थ की गप्पे हांकना, चुगली करना, खुशामद करना यह सब अयोग्य कृत्य हैं। इसे वाचिक पाप कहते हैं। इससे हमें बचना चाहिए। इसलिए हाथीदादा आप ही बताइये कि मैं अब क्या करूँ?’’ बाघमामा भारी चिंतित स्वर में बोले। (Jungle Stories | Stories)
 
हाथीदादा बड़ी गंभीरतापूर्वक बाघमामा की बातें सुन रहे थे। फिर हाथीदादा कहते हैं कि, ‘‘आपने अपने आप का विश्लेषण करके अपने आप को सुधारने का प्रयत्न जो किया इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है।’’

आगे हाथीदादा कहते है ‘‘इंस्पेक्टर साहब! आप मानसिक रूप से हमेशा नाम स्मरण करने की आदत डालिए। हमेशा मंत्र जाप चालू रखें। आप तो माँ अंबे के परम उपासक हैं। आप उनका मंत्र जाप भी कर सकते हो। यदि आप ऐसा करेंगे तो आपके दिमाग पर ऐसा कुप्र्र्रभाव नहीं आयेगा। और तो क्या बताऊँ आपको? आप हो एक इंस्पेक्टर, अपराधियों के साथ कड़क बर्ताव करना ही पड़ता है। इसलिए क्रोध तो करना ही पड़ेगा। कोई अपने स्वार्थ के लिए तो कठोरता नहीं दिखाते हैं। इसलिए यह पाप नहीं है। यदि आप अपने निजी स्वार्थ के लिए यह सब करते तो पाप कहलाता। किन्तु अपराधियों को सही रास्ते पर लाने के लिए कठोर अपशब्द बोलना कतई पाप नहीं है। (Jungle Stories | Stories)

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भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही कुरूक्षेत्र के मैदान में इतने सारे लोगों को मारने आये ही थे न? लेकिन उनका उद्देश्य भौतिक लाभ प्राप्त करना नहीं था, बल्कि वे तो सत्य और धर्म की संस्थापना करने हेतु इस युद्ध भूमि में पधारे थे। फिर उन्हें कैसे पाप लगेगा? हाँ, यदि वे इस भावना से युद्ध करवाते कि इन सारे लोगों को मारकर सब धन-दौलत मुझे मिल जायेगी तो वह पाप कहलाता, लेकिन जब किसी को मारकर या नष्ट करके सामाजिक स्थिरता और पवित्रता को बनायें रखने की भावना हो तब वह पाप नहीं किंतु पुण्य कहलायेगा। (Jungle Stories | Stories)

इसलिए इंस्पेक्टर साहब, आप अपने कर्म करते-करते प्रभु का जाप करते रहो, जिससे इस तकलीफ से भी मुक्त रहोगे। भगवान श्रीकृष्ण का लाडला अर्जुन तो नाम स्मरण में इतना संलग्न रहता था कि रात्रि में भी उसके शरीर के रोम-रोम से श्रीकृष्ण-श्रीकृष्ण की ध्वनि का उच्चारण होता था। इसी कारण ही तो अर्जुन महाभारत के युद्ध में तमाम लोगों को मौत के घाट उतार देने के बाद भी प्रभु श्रीकृष्ण का प्रिय बना रहा।’’

यह सुनकर बाघ मामा के दिल का बोझ हल्का हुआ। उन्होंने फिर से हाथीदादा को प्रणाम किया। (Jungle Stories | Stories)

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