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चमतकारपुर की सभा और एक अनोखा मेहमान
हिमालय की वादियों के करीब बसा एक खुशहाल राज्य था—'चमतकारपुर'। यहाँ के राजा, महाराजा गजेंद्र सिंह, अपनी वीरता के साथ-साथ कीमती रत्नों के शौक के लिए भी जाने जाते थे। उनकी सभा में एक से बढ़कर एक विद्वान थे, लेकिन उन सबमें सबसे चतुर और हाज़िरजवाब था—'चतुर बिरजू'। बिरजू की बुद्धि के चर्चे दूर-दूर तक थे और वह अपनी बातों से किसी का भी सिर चकरा सकता था।
एक दिन चमतकारपुर की राजसभा में एक अजनबी व्यापारी आया। उसका नाम था 'मायाजाल'। वह मखमली कपड़े पहने हुए था और उसके हाथ में चंदन की एक नक्काशीदार संदूक थी। उसने बड़े अदब से झुककर महाराज को प्रणाम किया और कहा, "महाराज, मैं दुनिया के सबसे दुर्लभ और जादुई हीरे लेकर आया हूँ। ये हीरे साधारण नहीं हैं, इन्हें 'स्वर्ग के हीरे' कहा जाता है।"
अदृश्य हीरों का जादुई दावा
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महाराज गजेंद्र सिंह की आँखें चमक उठीं। उन्होंने उत्सुकता से पूछा, "स्वर्ग के हीरे? हमें भी तो दिखाओ मायाजाल!"
व्यापारी ने बड़ी ही गंभीरता से संदूक खोला, लेकिन संदूक के अंदर मखमल के सिवाय कुछ नहीं था। सभा में सन्नाटा पसर गया। महाराज ने अपनी आँखें मलते हुए कहा, "पर इसमें तो कुछ नहीं है!"
मायाजाल मुस्कुराया और बोला, "महाराज, यही तो इनकी विशेषता है। ये हीरे केवल उन्हीं लोगों को दिखाई देते हैं जो अपने माता-पिता की सच्ची संतान हैं और जिनका हृदय पूरी तरह ईमानदार है। जो पापी हैं या जिनकी बुद्धि कमज़ोर है, उन्हें यह संदूक खाली ही नज़र आएगा।"
यह सुनते ही सभा में बैठे दरबारी एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। अब मामला ईमानदारी और सम्मान का था। अगर कोई कहता कि उसे कुछ नहीं दिख रहा, तो इसका मतलब होता कि वह पापी है।
दरबारियों की 'ईमानदारी' का नाटक
सबसे पहले महामंत्री आगे आए। उन्हें कुछ नहीं दिख रहा था, लेकिन उन्होंने सोचा, "अगर मैंने सच कहा, तो सब समझेंगे कि मैं महापापी हूँ।" उन्होंने हाथ बढ़ाकर हवा में कुछ पकड़ने का नाटक किया और बोले, "वाह! क्या चमक है! महाराज, ऐसा हीरा तो मैंने आज तक नहीं देखा। यह तो बिल्कुल जुगनू की तरह चमक रहा है।"
फिर क्या था, एक-एक करके सभी दरबारी संदूक के पास आए और काल्पनिक हीरों की तारीफों के पुल बाँधने लगे। कोई कहता, "देखो, यह नीला वाला कितना सुंदर है," तो कोई कहता, "यह लाल हीरा तो सूरज की तरह तप रहा है।"
महाराज भी धर्मसंकट में पड़ गए। उन्हें भी कुछ नहीं दिख रहा था, लेकिन अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए वे बोले, "हाँ, वाकई! ये हीरे तो अद्भुत हैं। मायाजाल, हम इन्हें अपने शाही खज़ाने के लिए खरीदना चाहते हैं।"
बिरजू का प्रवेश और संदेह
चतुर बिरजू पीछे खड़ा होकर सब देख रहा था। उसे समझ आ गया कि यह व्यापारी सबको बेवकूफ बना रहा है। वह मन ही मन मुस्कुराया और बोला, "महाराज, क्या मैं भी इन जादुई हीरों को देख सकता हूँ?"
महाराज ने कहा, "क्यों नहीं बिरजू! आओ, अपनी ईमानदारी का प्रमाण दो।"
बिरजू संदूक के पास गया। उसने अंदर झाँका, फिर अपना सिर हिलाया। उसने हवा में हाथ घुमाया और अचानक बोला, "अरे! यह क्या? महाराज, यह सबसे बड़ा हीरा तो संदूक से बाहर गिर गया है!"
मायाजाल हड़बड़ा गया, "कहाँ? कहाँ गिरा?"
बिरजू ने खाली फर्श की तरफ इशारा किया और बोला, "वहाँ, आपके जूतों के पास! अरे, देखिए! आप उस पर पैर रखने ही वाले थे! यह तो बहुत कीमती है।"
मायाजाल ने घबराहट में अपने पैर पीछे खींचे और खाली ज़मीन पर झुककर हाथ फेरने लगा। उसे भी कुछ नहीं दिख रहा था (क्योंकि वहाँ कुछ था ही नहीं), लेकिन वह अपने ही जाल में फंस गया था। उसने नाटक करते हुए कहा, "ओह हाँ! मिल गया, मिल गया। शुक्रिया बिरजू, तुमने इसे बचा लिया।"
जब हीरों की 'सफाई' शुरू हुई
बिरजू यहाँ नहीं रुका। उसने महाराज से कहा, "महाराज, इन हीरों पर थोड़ा गर्द (धूल) जम गई है। स्वर्ग के हीरों को साफ़ करने के लिए 'अदृश्य गंगाजल' चाहिए, जो केवल चतुर लोग ही ला सकते हैं। मैं अभी लेकर आता हूँ।"
बिरजू बाहर गया और एक खाली बाल्टी लेकर लौटा। उसने महाराज और सभा के सामने नाटक किया जैसे वह बाल्टी से पानी छिड़क रहा हो। उसने सीधे व्यापारी मायाजाल के चेहरे पर 'अदृश्य पानी' फेंकने का अभिनय किया।
बिरजू चिल्लाया, "सावधान! अब मैं इन हीरों को एक जादुई कपड़े से रगडूँगा। व्यापारी जी, आप ज़रा हीरा पकड़िए ताकि मैं उसे रगड़ सकूँ।"
मायाजाल ने डरते-डरते अपना हाथ आगे बढ़ाया। बिरजू ने उसके खाली हाथ पर ज़ोर-ज़ोर से अपना रूमाल रगड़ना शुरू किया।
बिरजू बोला, "अरे व्यापारी जी, आप चिल्ला क्यों नहीं रहे? स्वर्ग के हीरे जब साफ़ होते हैं, तो वे बहुत गर्म हो जाते हैं। क्या आपको गर्मी महसूस नहीं हो रही? अगर नहीं हो रही, तो शायद आप इन हीरों के असली मालिक नहीं हैं!"
व्यापारी का चेहरा पसीने से भीग गया। उसने झूठ बोलते हुए कहा, "हाँ... हाँ! बहुत गर्म है! उफ़, मेरा हाथ जल रहा है!"
सच्चाई का पर्दाफाश: बिरजू का मास्टर स्ट्रोक
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बिरजू ने अचानक महाराज की ओर देखा और कहा, "महाराज, अब समय आ गया है कि हम इन हीरों की असली परीक्षा लें। मैंने सुना है कि स्वर्ग के हीरे अगर ज़मीन पर पटके जाएँ, तो वे मधुर संगीत निकालते हैं। क्यों न हम सबसे बड़े हीरे को इस पत्थर के फर्श पर पटक कर देखें?"
मायाजाल के होश उड़ गए। उसे पता था कि अगर वह कुछ पटकने का नाटक करेगा, तो आवाज़ नहीं आएगी। उसने कहा, "नहीं, नहीं महाराज! ऐसा मत कीजिये, ये बहुत नाज़ुक हैं!"
बिरजू मुस्कुराया और बोला, "घबराइए मत व्यापारी जी, अगर ये असली हैं तो संगीत निकलेगा, और अगर ये नकली हैं या अदृश्य हैं, तो कुछ नहीं होगा। और अगर आवाज़ नहीं आई, तो इसका मतलब है कि यहाँ सभा में बैठा हर व्यक्ति, जिसमें आप भी शामिल हैं, पापी है क्योंकि उसे आवाज़ सुनाई नहीं दी!"
महाराज को अब बिरजू का खेल समझ आ गया था। उन्होंने अपनी हँसी दबाते हुए कहा, "बिल्कुल सही! बिरजू, हीरा पटको!"
बिरजू ने संदूक से 'अदृश्य हीरा' उठाने का नाटक किया और उसे ज़ोर से फर्श पर 'फेंका'। सन्नाटा छा गया। कोई आवाज़ नहीं आई।
बिरजू ने मासूमियत से पूछा, "व्यापारी जी, क्या आपको संगीत सुनाई दिया?"
मायाजाल पसीने-पसीने होकर काँपने लगा। उसने सोचा कि अगर वह 'हाँ' कहेगा तो आवाज़ न आने पर पकड़ा जाएगा, और 'ना' कहेगा तो पापी कहलाएगा। उसने घुटने टेक दिए और बोला, "महाराज! मुझे क्षमा करें। न यहाँ कोई हीरा है और न ही कोई स्वर्ग का रहस्य। मैं तो बस आपकी धन-दौलत लूटने आया था। पंचतंत्र की कहानियों की तरह ही लालच ने मुझे अंधा कर दिया था।"
उपसंहार: बुद्धि की जीत
महाराज गजेंद्र सिंह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। उन्होंने सभी दरबारियों की ओर देखा जो शर्म से सिर झुकाए खड़े थे क्योंकि वे भी झूठ बोल रहे थे। महाराज ने मायाजाल को कारागार में डाल दिया और बिरजू को असली हीरों का एक हार इनाम में दिया।
बिरजू ने हार लेते हुए कहा, "महाराज, हीरे वही अच्छे होते हैं जो आँखों से दिखें और दिल को सुकून दें, न कि वो जो केवल 'ईमानदारी' का नाटक करवाएं।" पूरा दरबार बिरजू की बुद्धिमानी और उसकी हँसी से गूँज उठा।
सीख (Moral of the Story):
बुद्धि और तर्क (Logic) का इस्तेमाल करके किसी भी झूठ का पर्दाफाश किया जा सकता है। दूसरों की देखा-देखी या समाज के डर से कभी भी असत्य का साथ नहीं देना चाहिए, क्योंकि सच को प्रमाण की ज़रूरत नहीं होती।
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