हिंदी मजेदार कहानी: जुगनू बाबू की पेंशन

पचास वर्तष पहले का एक वाकया है, साठ वर्ष तक दफ्तर में सुख से राज करने के पश्चात्‌ जुगनू बाबू रिटायर हुए और अपने घर में आ बैठे। पहली तारीख को उनकी पेंशन मनीआर्डर से घर पहुंचने लगी।

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जुगनू बाबू की पेंशन

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हिंदी मजेदार कहानी: जुगनू बाबू की पेंशन:- पचास वर्तष पहले का एक वाकया है, साठ वर्ष तक दफ्तर में सुख से राज करने के पश्चात्‌ जुगनू बाबू रिटायर हुए और अपने घर में आ बैठे। पहली तारीख को उनकी पेंशन मनीआर्डर से घर पहुंचने लगी। छ: महीने तक बिना किसी बाधा के पेंशन उनके घर पहुंचती रही। पहली तारीख को डाकिया घर के सामने आकर साईकिल की घंटी बजाता। जुगनू बाबू इस घंटी की आवाज को उसी तरह पहचानते थे जैसे गाय अपने बछड़े का रंभाना पहचानती है। घंटी सुनकर जुगनू बाबू गर्व से ऐंठते हुए घर से बाहर निकलते और मनीआर्डर फार्म पर हस्ताक्षर कर पेंशन की रकम ले लेते। एक सौ बीस रूपये बहत्तर पैसे। बहत्तर पैसे जुगनू बाबू डाकिये के लिए छोड़ देते। डाकिया उन्हें सलाम मारता और आगे बढ़ जाता। यह पहली तारीख का रूटीन कार्यक्रम था। पहली अप्रैल को इस रूटीन में थोड़ी गड़बड़ पड़ी। (Fun Stories | Stories)

उस दिन डाकिये की साइकिल की घंटी दरवाज़े पर सुनाई दी। जुगनू बाबु बनियान पहने थे। उन्होंने झटपट उसके ऊपर कुर्ता पहना और पेंशन लेने मुस्कुराते हुए बाहर निकले। डाकिये ने कहा- "बाबू जी, आज आपके नाम मनीआर्डर नहीं, रजिस्टर्ड लैटर आया है"।

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रजिस्टर्ड लैटर सुन कर जुगनू बाबू को अचंभा हुआ। उन्होंने यह सोचकर अपने धड़कते दिल को धैर्य दिया कि अवश्य ही सरकार ने मनीआर्डर की तकलीफ से बचने के लिये रजिस्टर्ड लिफाफे में करेंसी भेजी होगी। लिफाफा चैक करते ही उनका संदेह दूर हो गया। लिफाफे में करेंसी नहीं, पेंशन कार्यालय की तरफ से एक पत्र था- प्रिय महोदय, आपको विदित होगा कि पहली अप्रैल से नया वित्त आरम्भ होता है। नियमों के अनुसार पेंशन केवल जीवित व्यक्ति को ही मिलती है। इस लिए आप से निवेदन है कि अपने जीवित होने का प्रमाण-पत्र कार्यालय को भेज दें ताकि नये वित्त वर्ष में आपको पेंशन भेजी जा सके।

जुगनू बाबू ने पत्र पत्नी की ओर बढ़ाते हुए कहा- "पेंशन नहीं, सरकार की तरफ से यह रजिस्टर्ड पत्र आया है। मुझे सिद्ध करना है कि मैं जीवित हूं वरना मुझे पेंशन नहीं मिलेगी"। पत्नी ने सुझाव दिया- "अरे, इस में चिंता की क्या बात है? आप स्वयं कार्यालय में जाकर पेंशन ले आइये"। (Fun Stories | Stories)

वाह! कितना आसान तरीका है। जब पेंशन लेने वाला साक्षात हाजिर हो जाये तो उसके जीवित होने का और क्या प्रमाण चाहिए। हाथ कंगन को आरसी क्‍या, पढ़े लिखे को फारसी क्या? ताज्जुब है, यही बात मुझे क्‍यों नही सूझी।

अगले दिन जुगनू बाबू ने नहा-धोकर नए कपड़े पहने और अपनी पेंशन लेने चले। पेंशन के दफ्तर में पहुंच कर जुगनू बाबू ने पूछताछ कर उस क्लर्क का पता किया जो ऐसे केसों से निपटता था। जुगनू बाबू ने उस क्लर्क से कहा- "मैं अपनी पेंशन लेने आया हूं"।

"आपका नाम?"

"जुगनू बाबू"।

ओह, जुगनू बाबू। हमारा पत्र आपको मिला होगा। आप अपने जीवित होने का प्रमाण-पत्र साथ लाए हैं"।

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"देखिए न, मैं स्वयं ही पेंशन लेने साक्षात हाजिर हो गया हूं अब आपको और क्या प्रमाण चाहिए"। जुगनू बाबू ने हंस कर क्लर्क को प्रभावित करने की चेष्टा की। (Fun Stories | Stories)

पत्थर-दिल क्लर्क पर कोई प्रभाव न पड़ा। उसने बेरूखी से उत्तर दिया- "जुगनू बाबू, मैं अपनी रिकार्ड फाइल में आपके भारी-भरकम शरीर को रखकर फारवर्ड नहीं कर सकता। इतनी बड़ी कोई फाइल मेरे पास नहीं है। आप कोई लिखित प्रमाण लाइए"।

जुगनू बाबु थके कदमों से वापिस लौटे। उनकी समझ में न आता था कि स्वयं को जीवित कैसे सिद्ध करें? जिंदगी में उन्होंने कितनी ही गहरी समस्याएं सुलझाई थीं, किन्तु इस समस्या के सामने उनकी बुद्धि ने घुटने टेक दिये। घर पहुंचे तो पत्नी ने नया सुझाव दिया- "वे लिखित प्रमाण-पत्र मांगते हैं तो क्या हुआ? अपना राशन-कार्ड ले जाइये। राशन-कार्ड पर उसी का नाम होगा जो जीवित है"।

जुगनू बाबू का उदास चेहरा फिर खिल उठा। उन्होंने पत्नी की प्रशंसा की- "तुम तो बहुत बुद्धिमान हो। तुम्हें तो हाई कोर्ट में जज होना चाहिए था। कितनी आसानी से कठिनाई हल हो गई"।

जुगनू बाबू ने अपना राशन-कार्ड लिया और अगले दिन फिर पेंशन के दफ्तर में हाजिर हो गये। राशन-कार्ड पर परिवार के मुखिया के स्थान पर स्पष्ट मोटे शब्दों में लिखा था- जुगनू बाबू। क्लर्क ने राशन-कार्ड देखा तो जुगनू की बुद्धि पर तरस खाकर बोला- "यह भी कोई जीवित होने का प्रमाण है। दिल्ली में साठ हजार राशन कार्ड जाली बने हुए हैं। किसी सदस्य की मृत्यु हो जाने पर भी परिवार के अन्य लोग अधिक चीनी के लालच में उसका नाम नहीं कटवाते"।

जुगनू बाबू के सब्र का प्याला भर गया उन्होंने चिढ़कर कहा- "तो आप ही बता दीजिए कि आप कैसा प्रमाण चाहते हैं?"

क्लर्क ने उत्तर दिया- "आपके मुहल्ले में कोई काऊंसिलर तो जरूर होगा। आप उससे लिखवा लाइये कि आप जीवित हैं। इस प्रमाण से काम चल जाएगा"। (Fun Stories | Stories)

जुगनू बाबू ने आज तक लाल-फीताशाही की चक्की में डाल कर अपने दफ्तर के चक्कर लगवाते लगवाते कितने ही...

जुगनू बाबू ने आज तक लाल-फीताशाही की चक्की में डाल कर अपने दफ्तर के चक्कर लगवाते लगवाते कितने ही लोगों के कई जोड़ी बूट घिसवा दिये थे। उन्हें तब तक क्या खबर थी कि एक दिन उन्हें स्वयं भी लाल फीताशाही की निर्मम चक्की में पिसना होगा। उन्हें कबीर का दोहा याद आया माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय, एक दिन ऐसा आएगा, मै रौंदूंगी तोय।

जुगनू बाबू अपने घर जाने की बजाय सीधा काऊंसिलर के घर पर जा टपके। काऊंसिलर उस समय एक ठेकेदार से इसका हिसाब लगा रहे थे कि ठेकेदार को सड़क बनाने का ठेका दिलवाने के बदले में उन्हें कितना कमीशन मिलेगा। ठेकेदार दस प्रतिशत देने को तैयार था, काऊंसिलर पन्द्रह प्रतिशत मांगते थे। काऊंसिलर महोदय मन में ठान चुके थे कि साढ़े बारह परसेंट से कम कमीशन हर्गिज न लेंगे। बात अत्यंत नाजुक मोड़ पर पहुंच चुकी थी जब कबाब में हड्डी बन कर जुगनू बाबू अन्दर घुसे।

काऊंसिलर महोदय ने जुगनू बाबू की परेशानी सुनी और साफ मना कर दिया- "मैं आपको जीवित होने का प्रमाण पत्र नहीं दे सकता। पिछले वर्ष एक साहब ने मुझसे एक जीवित आदमी के मृत होने का प्रमाण-पत्र लेकर उस बेचारे की लाइफ इंश्यौरेंस की रकम पर हाथ साफ कर दिया। मैंने तब से कसम खा ली कि किसी के जीने मरने के झगड़े में नहीं पडूंगा। मुझे क्षमा कीजिए"।

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जुगनू बाबू वहां से अपना सा मुंह लेकर लौटे पूरा सप्ताह वह इसी चिंता में लीन रहे कि कौन सा प्रमाण देकर अपने को जीवित सिद्ध किया जाए। सहसा उन्हें याद आया कि जीवन-मरण कार्यालय मृत व्यक्तियों का रिकार्ड रखता है। यदि जीवन-मरण कार्यालय दे दे कि जुगनू बाबू जीवित हैं तो अवश्य काम चल जाएगा। (Fun Stories | Stories)

जुगनू बाबू जीवन-मरण कार्यालय में पहुंचे। वहां क्लर्क ने अपना रजिस्टर चेक करने के पश्चात उन्हें लिखकर दे दिया- हमारे रिकार्ड में सिद्ध होता है कि मकान नम्बर 666 राम नगर के निवासी जुगनू बाबू अभी तक जीवित हैं। यदि वे मृत हैं तो उन्होंने अपनी मृत्यु की सूचना हमारे कार्यालय में दर्ज नहीं कराई।

इस प्रमाण-पत्र को लेकर जुगनू बाबू पेंशन लेने पहुँचे तो क्लर्क ने उन्हें लगभग झिड़क ही दिया, "यह जीवित होने का सर्टिफिकेट है? नानसेंस। हजारों आदमी मर जाते हैं पर अपनी मृत्यु की सूचना जीवन-मरण दफ्तर में नही देते। उस दफ्तर का सर्टिफिकेट कौन मान सकता है? मुझे तो लगता है कि बेचारे जुगनू बाबू अवश्य ही स्वर्ग सिधार चुके हैं और उनके वेश में आप स्वयं जुगनू बाबू हो और अपने को जीवित सिद्ध न कर सके"। यह लताड़ सुनकर जुगनू बाबू ने चुपचाप वापस अपने घर की राह ली।

दिन उड़ते चले। जुगनू बाबू इसी चिंता में दिन-ब-दिन दुबले होने लगे कि कैसे अपने जीवित होने का प्रमाण दें। उन्होंने कई प्रमाण सोचे पर हरेक प्रमाण में कोई न कोई कमी मौजूद थी। इसी हैस-बैस में दस माह बीत गये। फरवरी आ पहुंची। कहावत है कि बारह वर्ष के पश्चात घूरे के दिन भी फिरते हैं। जुगनू बाबू के दिन भी बदले। इसी बीच चुनाव आ गए। मुहल्ले के काऊंसिलर साहब फिर चुनाव में खड़े हुए। उन्होंने घर घर में जाकर वोट मांगे। जुगनू बाबू के पास आये तो जुगनू बाबू ने तुरन्त कहा- "काऊंसिलर साहब, वोट चाहिए तो मुझे जीवित होने का प्रमाण पत्र दीजिए"। (Fun Stories | Stories)

कभी गाड़ी नाव पर, कभी नाव गाड़ी पर। काऊंसिलर साहब को वोट चाहिए थे। उन्होंने बिना चूँ चपड़ के जुगनू बाबू को लिख कर दे दिया कि वे जीवित हैं। अपने जीवित होने का प्रमाण पाकर जुगनू बाबू में नई जान पड़ गई।
वे अब तक अपने आपको सचमुच ही मृत समझने लगे थे। वे उछलते कूदते पेंशन कार्यालय में पहुंचे और अपनी अर्जी दे आये। क्लर्क ने काऊंसिलर की मोहर देखकर बिना हीलो-हुज्जत के उनकी अर्जी रख ली।

कुछ ही दिनों बाद जुगनू बाबू के दरवाजे पर डाकिये की मधुर घंटी बजी। जुगनू बाबू बाहर लपके। उनका मन उछल रहा था। इस बार उन्हें पूरे दस महीने की पेंशन इकट्ठी मिलनी थी- बारह सौ सात रूपये बीस पैसे।

डाकिये ने मनिआर्डर फार्म जुगनू बाबू के आगे कर दिया। केवल एक सौ बीस रूपये, बहत्तर पैसे।

नीचे संदेश वाले कूपन पर लिखा हुआ था- प्रिय महोदय, आपने केवल जनवरी मास में जीवित होने का प्रमाण दिया है इसलिए जनवरी की पेंशन आपको भेजी जा रहा है। कृप्या पिछले वर्ष अप्रैल से दिसम्बर तक अपने जीवित होने का प्रमाण-पत्र हमें शीघ्र भिजवा दें ताकि शेष पेंशन भी भिजवाई जा सके!

जुगनू बाबू ने संदेश पढ़ा और अनकी आंखों में गहरा अंधेरा छा गया। (Fun Stories | Stories)

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