Motivational Story: जायदाद का सच
एक था किसान, उसके दो पुत्र थे। थोड़ी सी जमीन थी उसके पास, जिसके बल बूते पर उसने अपने परिवार का पेट पाला था। और इसके अतिरिक्त कुछ थोड़ा बहुत धन भी बचाया था।वह किसान बहुत ही मेहनती था।
एक था किसान, उसके दो पुत्र थे। थोड़ी सी जमीन थी उसके पास, जिसके बल बूते पर उसने अपने परिवार का पेट पाला था। और इसके अतिरिक्त कुछ थोड़ा बहुत धन भी बचाया था।वह किसान बहुत ही मेहनती था।
एक बार की बात है, दो जुड़वा पोलर बेयर थे। माँ की देख -रेख में दोनों के दिन अच्छे गुजर रहे थे कि एक दिन माँ ने ऐलान कर दिया, ‘‘कल से तुम्हे खुद अपना ख्याल रखना होगा।
जैसे ही रात हुई, आस-पड़ोस के बच्चों ने दादी को फिर आ घेरा कहानी सुनने के लिए। बच्चों में अजय, संजय, दिलीप, गीता, राजू, मोहम्मद और सरदार अचरज सिंह का बेटा रणजीत व जेकब सभी थे।
बहुत पहले की बात है, एक गांव में एक संत रहते थे। उनके बारे में सब लोग यही मानते थे कि वह अत्यंत विद्वान तथा त्यागी तपस्वी थे। वह सुबह उठते तो नहा-धोकर तपस्या करने बैठ जाते। शाम होती तो भगवान की उपासना होती।
हर व्यक्ति को अपने आप पर गर्व होना ही चाहिए, वे अक्सर कहा करते थे। वे ईश्वर चन्द्र विद्या सागर थे। उन दिनों वे संस्कृत कॉलेज के प्रधानाचार्य थे। चूंकि कॉलेज के प्रधान थे।
दीपू के कई मित्र थे। वह विद्यालय का सबसे प्रसिद्ध लड़का था। वह पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद में भी सदैव आगे रहता था। वह कक्षा के सभी विधार्थियों से बड़े प्रेम से बात करता। उसकी बोली में रस घुलता था।
‘‘तुम कब बड़े होगे"? दिन में कई बार राजा को अपनी मां से ये वाक्य सुनना पड़ता था। राजा तेरह साल का था। उसे एक बड़ी अजीब परिस्थिति का सामना करना पड़ रहा था।